सोमवार, 13 दिसंबर 2010

संसद पर हमले में शहीदों की शहादत पर सियासत



आज संसद पर हमले की नौवीं वर्षी मनायी गयी। संसद हमले में मारे गये सभी नौ लोगों को आज संसद भवन में उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी,प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह,यूपीए अध्यक्ष सोनिया गाँधी, विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज,लालकृष्ण आडवाणी के साथ साथ कई नेताओं ने शहीदों की तस्वीरों पर पुष्प अर्पित कर उन्हें भावभिनी श्रद्धांजली दी,ऐसे में इन शहीदों की याद तो इन नेताओं को आ गई लेकिन शहीदों की शहादत का मतलब शायद सभी भुल गये हैं, ऐसा लगता है।ये अलग बात है कि पुरे वर्ष में केवल यही एक दिन होता है जब इन वीर सपूतों की याद हमारे इन नेताऔं को आती है। आजतक हम या हमारे नेता इनकी कुर्बानी से क्या सीख पायें हैं ये तो शायद इसी से पता चलता है कि संसद में हमले के बाद भी समयांतराल पर आतंकी हमले होते रहे हैं।पक्ष-विपक्ष आज भी इस शहादत के मौके पर आरोपों प्रत्यारोपों का खेल खेल रहे हैं।

पक्ष-विपक्ष के आरोपों प्रत्यारोपों को दौर में शहीदों की शहादत के एक-एक साल गुजरते रहे और हमने इस शहादत की नौवीं वर्षी मना ली।संसद पर हमले की साजिश रचने के मामले में दोषी अफजल गुरु को आजतक सजा नहीं मिल पाईं। आज शहीदों के शहादत को श्रद्धांजलि देने के बाद विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने पत्रकारों को दिये अपने बयान में कहा कि जब अफजल गुरु पर दोष सिद्ध हो चुका है, उच्चतम न्यायालय उसे दोषी मान चुकी है तो फिर अफजल गुरु को सजा क्यों नहीं दी गई है।बिना अपराधियों को सजा दिलाये,श्रद्धांजलि अर्पित करना रस्म अदायगी सा लगता है। यही नहीं भाजपा अध्यक्ष नीतिन गड़करी ने तो पहले यह तक कह दिया था की ऐसा लगता है कि अफजल कांग्रेस का दामाद है, कांग्रेस उसे बचाने की कोशिश कर रही है। देश में हुए इतने बड़े आतंकी हमले पर पक्ष विपक्ष नौ सालों से सियासत करने में लगी रही है।बजाय इसके की इस घटना की दोनों पक्ष बैठकर समीक्षा करें,ताकि ऐसी घटना दोबारा न हो।संसद का शीतकालीन सत्र बाईस दिन के स्थगन के बाद आज समाप्त हो गया। मांग विपक्ष ने 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले के लिए जेपीसी के गठन की कि लेकिन सत्ता पक्ष इसके लिए तैयार नहीं हुआ।इसी बीच 13 दिसंबर 2001 को संसद हमले के शहीदों को याद करने के लिए जब पक्ष-विपक्ष के नेता साथ खड़े थे तो इन्हें देखकर आश्चर्य होता है।ये वही नेता हैं जो देश की जनता के पैसे में से लगभग 170 करोड़ का नुकसान केवल 22 दिनों की संसद की कार्यवाही बाधित कर करा चुके हैं।इससे ऐसा लगने लगा है कि ये राजनेता शहीदों की मजारों पर केवल श्रद्धांजलि अर्पित करने तक को हीं अपनी जिम्मेवारी मानते हैं।दो मिनट के मौन के बाद जब इनकी आँखें खुलती हैं तो फिर आरोपों-प्रत्यारोपों का दौर शुरू हो जाता है। अफजल गुरु मामले पर अंततोगत्वा अंबिका सोनी ने यह कहकर पीछा छुड़ा लिया कि कानून अपने हिसाब से काम करेगा,इस मामले पर किसी तरह की राजनीति नहीं होनी चाहिए। राजनीति के इस दाव पेंच में सबसे ज्यादा नुकसान जनता का और उन वीर सपूतों का होता है जिनके शहादत पर सियासत का खेल खेला जाता है।

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