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गुरुवार, 30 दिसंबर 2010

सरकार से बातचीत को तैयार- गुर्जर नेता




गुर्जर आंदोलन के ग्यारहवें दिन सरकार से बातचीत के लिए गुर्जरों द्वारा ग्यारह सदस्यीय बैंसला कमेटी को सरकार के सामने अपनी मॉगो को रखने के लिए गुर्जरों ने भेजने की बात कही है। गुर्जरों ने पॉच प्रतिशत आरक्षण की मॉग को लेकर दस दिनों से आंदोलन छेड़ रखा था जिसमें उन्होंने रेल, सडक के साथ-साथ कई अन्य सेवाओं को बाधित कर रखा था। यहॉ तक कि मॉग नहीं माने जाने पर गुर्जरों ने दूध की सप्लाई भी ठप करने की धमकी सरकार को दे ड़ाली थी। गुर्जरों का आंदोलन अब उनके इस फैसले के बाद कमजोर पडता नजर आ रहा है।

गौरतलब है कि राजस्थान में वसुंधरा राजे ने पॉच साल तक गुर्जरों को पॉच प्रतिशत आरक्षण का वादा करके हीं राज किया और गुर्जरों के आरक्षण का वादा न पूरा होने के चलते हीं वसुंधरा राजे को राजस्थान की सत्ता से हाथ धोना पड़ा। वसुंधरा राजे ने राजस्थान में गुर्जरों को पॉच प्रतिशत आरक्षण का वादा पूरा भी कर दिया होता लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में यह कह दिया कि केन्द्र सरकार बो या राज्य सरकार पचास प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण की सीमा को नहीं बढ़ा सकते जिसने वसुंधरा राजे के वादे पर पानी फेर दिया। क्योंकि पहले से हीं उन्नचास प्रतिशत आरक्षण सरकार बॉट चूकी थी ऐसे में गुर्जरों के हिस्से में एक प्रतिशत आरक्षण आया जिसने गुर्जरों के गुस्से के आग में घी का काम किया । वसुंधरा राजे को अपनी सत्ता से अगले चुनाव में हाथ धोनी पड़ी। राजस्थान में कांग्रेस की सरकार अशोक गहलोत के नेतृत्व में सत्ता में आयी और वसुंधरा राजे द्वारा किये गुर्जरों के आरक्षण के वादे पर उसने ध्यान ही नही दिया। तब तक देश के अन्य राज्यों में रह रहे गुर्जरों ने केन्द्र और राज्य सरकारों से आरक्षण की मॉग कर ड़ाली।

देखते हीं देखते गुर्जरों के आरक्षण की इस मॉग ने आंदोलन का रूप ले लिया क्योंकि उच्चतम न्यायालय के फैसले के खिलाफ जाकर केन्द्र और राज्य सरकारें गुर्जरों को आरक्षण देने में असमर्थ थी।

गुर्जरों ने अपने लिए पॉच प्रतिशत आरक्षण की मॉग को लेकर लगातार केन्द्र और राज्य सरकार के उपर दबाब बनाने के लिए देशव्यापी गुर्जर महापंचायत बनाकर सरकार से बातचीत करने की राह चुनी, लेकिन तब भी केन्द्र और राज्य सरकारों ने उनकी बात नहीं मानी तो गुर्जरों को अपनी मॉग के लिए सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतर आये। गुर्जरों ने जगह-जगह धरने दिये प्रदर्शन किये तब जाकर केन्द्र सरकार ने उनकी इस मॉग पर विचार करने की बात कही।

सरकार के इस आश्वासन के बाद गुर्जरों ने आंदोलन वापस ले तो लिया लेकिन काफी लंबे इंतजार के बाद भी जब केन्द्र सरकार का कोई फैसला गुर्जरों के हक में नहीं आया तो गुर्जरों ने केन्द्र और राज्य दोनों सरकारों के खिलाफ फिर से मोर्चा खोल दिया। दस दिनों के आंदोलन के बाद भी जब सरकार की नीति स्पष्ट नहीं हो पाई तो गुर्जरों ने ग्यारह सदस्यीय बैंसला कमेटी को अपनी मॉगो को रखने के लिए सरकार के समक्ष बातचीत के लिए भेजने का फैसला लिया है। इसके बाद गुर्जरों ने आंदोलन वापिस लेने की घोषणा की है। अब बस यह देखने की जरूरत है कि सरकार और ग्यारह सदस्यीय बैंसला कमेटी

के बीच इस मसले पर बातचीत का क्या नतीजा निकलता है, नहीं तो गुर्जरों का आंदोलन रोष बनकर बार-बार देश को जलाता रहेगा।

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