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मंगलवार, 11 अक्तूबर 2011

आर्थिक उदारीकरण के बीस साल और संस्कृति पर प्रभाव


आज देश के और विशेषत: हिंदी समाज के अंदर सांस्कृतिक नवजागरण की आवश्यकता की बात की जाए तो ये स्पष्ट पता चलता है कि देश में और हिंदी समाज दोनों में आर्थिक उदारीकरण के बाद तेजी से बदलाव आया है ,बीस बर्ष पहले भारत ने आर्थिक उदारीकरण के रास्ते विश्व के कई देशों के लिए व्यापार और व्यवसाय का जो मार्ग खोला उससे देश की अर्थव्यवस्था को एक नई ऊँचाई मिली है, ऐसे में देश में रोजगार की संभावनाऐं बढ़ी हैं । हलांकि यह आर्थिक उदारीकरण वैश्विक संस्कृति का एक हिस्सा है, ऐसे में जब विश्व की अलग-अलग संस्कृतियॉ देश की विविध संस्कृतियों के साथ मिलीं तो एक नये संस्कृति का सृजन हुआ और वह नई संस्कृति एक बेहतर जीवन शैली के तौर-तरीके, शिक्षा के नये-नये तरीके, नई-नई तकनीकों को साथ लेकर आईं ऐसे में जब देश की संस्कृति के साथ विदेशी संस्कृति के कुछ बेहतर तथ्य मिलकर एक नई संस्कृति का सृजन करते हैं तो इसमें कोई बुराई नहीं है । इस नई संस्कृति के सृजन को हीं सांस्कृतिक नवजागरण कहा गया ।










नव उदारवादी व्यवस्था ने हमारी संस्कृति को तो प्रभावित किया लेकिन इस व्यवस्था के आने से रोजगार के नये-नये अवसर पैदा हुए साधारण जीवनशैली से आगे बढ़कर हम एक अलग और सुविधाजनक जीवनशैली गुजार रहे हैं, शिक्षा और तकनीक के क्षेत्र में हो रहे नित नये प्रयोगों ने हमारे अंदर एक नया जोश भर दिया । सबसे बड़ी बात जो इस नव उदारवादी व्यवस्था के आने से आयी, वह है हमारी सामाजिक संरचना में बदलाव का आना, हमारा देश विविधता में एकता का देश है, ऐसे में देश की विविध संस्कृति के अलावा विदेशों के विविध सांस्कृतिक रंगों को जानने और उसकी अहमियत को समझने के साथ-साथ उसको अपनी संस्कृति का हिस्सा बनाने का मौका हमें नव उदारवादी व्यवस्था ने हीं प्रदान किया । ऐसे में देश और विदेशों के विविध सांस्कृतिक रंगों को एक साथ मिलाकर जो संस्कृतिक समरूपता लाने की कोशिश की जा रही है, या सांस्कृतिक समरूपता को जो महत्व दिया जा रहा है, वह गलत नहीं है ।
देश की तमाम सांस्कृतिक विविधताओं को बचाने के क्षेत्र में हमारे सांस्कृतिक संगठन जिस तरह से कार्य कर रहे हैं, वह काबिलेतारीफ है हलांकि इनके काम करने की शैली में थोड़ा सा बदलाव आया है, फिर भी आज नुक्कड़ नाटक, थियेटर, संगीत और नृत्य की अलग-अलग शैलियों के प्रर्दशन के लिए अलग- अलग तरह के आयोजन आज भी सांस्कृतिक संगठन करते रहते हैं, रामलीला, कृष्णलीला जैसे कई धार्मिक सांस्कृतिक कार्यक्रमों का मंचन भी ये संगठन समय-समय पर करते रहते हैं । फिल्मों के प्रर्दशन के जरिऐ भी देश की सांस्कृतिक विविधताओं से जनता को अवगत कराने का काम चलता रहा है, अलग बात है कि अब इनके प्रदर्शन की जगह थोड़ी सी बदलकर मल्टीप्लेक्स ने लिया है । जहां तक समाज में सांस्कृतिक भूमिका के महत्व की बात है तो कहा जा सकता है कि संस्कृति हमारे अंदर एक चेतना पैदा करने का काम करती है, हमें एक दूसरे से जोड़ने का काम करती है, हमारे अंदर संस्कारों का निर्माण करती है, हममें संस्कारों के प्रति समझ विकसित करने का काम करती है ।






आज संस्कृति बाजार से संचालित और प्रभावित नहीं हो रही है, बल्कि बाजारवाद ने अन्य संस्कृतियों के अच्छे और सकारात्मक तथ्यों को हमारी संस्कृति से जोड़कर हमारी संस्कृति का एक नया ढ़ाँचा तैयार किया है जिसे हम नवीन संस्कृति कहते हैं । हां, बाजारवाद से आम ज़िंदगी में समय की कमी जरूर आयी है, लेकिन लोगों के पास सुख सुविधाओं के ढ़ेरों नये संसाधन भी इसी बाजारवाद की देन है, इसे प्राप्त करने के लिए थोड़ी ज्यादा मेहनत की जरूरत है, इसलिए आम जनमानस के परिश्रम करने की क्षमता में बढ़ोत्तरी हुई है । ऐसे में ये समझना की हमारा जीवन व्यापार बन रहा है सर्वथा अनुचित है ।
आर्थिक उदारीकरण से प्रतिरोध की संस्कृति जरूर विकसित हुई है । क्योंकि नवसंस्कृति के सृजन के साथ कुछ नई विचारधाराओं ने समाज में अपना स्थान बना लिया है । पहले ईद, होली, दीपावली जैसे कई त्योहारों पर गले लगकर या गले लगाकर बधाईयाँ देने की परंपरा थी इसमें कुछ नई परंपराऐं जुड़ गई हैं, जैसे कार्ड़ के जरिऐ बधाई देने की परंपरा, एसएमएस के द्वारा बधाई देने की परंपरा, साथ ही साथ चॉकलेट डे, फ्लावर्स डे, मदर्स डे, फादर्स डे, वेलेंटाइन डे और न जाने ऐसे कितने नये त्योहार हमारी संस्कृति का हिस्सा बन गई हैं । हलांकि इन त्योहारों को मनाने और बधाई देने की इस नई परंपरा का भी अपना मजा है, उपर से भाग दौड़ भरी ज़िंदगी में से समय निकाल कर अगर लोग इस तरह के माध्यमों के जरिऐ हीं एक दूसरे से जुडे रहने की कोशिश कर रहे हैं तो ये भी हमारी संस्कृति के लिए एक नवसृजनात्मकता हीं तो है ।








ऐसे में सांस्कृतिक संगठनों और संस्कृतिकर्मियों पर यह जिम्मेदारी आ गई है कि वो समय–समय पर लोगों को अपनी सभ्यता और संस्कृति को जानने, समझने और उसे संजो कर रखने के लिए प्रेरित करते रहें । इसके अलावा हर परिवार के अंदर बड़ों का यह दायित्व होना चाहिए की वह अपने बच्चों के मन में अपनी संस्कृति के प्रति बचपन से हीं चेतना पैदा करें ताकि बच्चे अपनी प्रौढ़ावस्था में अपनी संस्कृति के प्रति सचेत रहें । बच्चों द्वारा धर्मग्रंथों के पठन-पाठन पर भी बल देने की आवश्यकता है । नई संस्कृति के सृजन के साथ हीं भाषा की भूमिका की अहमियत और बढ़ गई है, और इसिलिए बाजारवाद से पैदा इस संस्कृति के लिए विश्व की सभी देशों को जोड़ने के लिए अंग्रेजी जैसी भाषा एक वरदान साबित हो रही है, रही बात बाजार की संस्कृति के विरोध की तो ऐसी संस्कृति के विरोध की आवश्यकता नहीं है ।
जहाँ तक बात विदेशी पूंजी की है तो इसने अपने पक्ष में एक खास तरह की संस्कृति का विकास तो किया है पर ये विकास हमारी संस्कृति के लिए खतरनाक नहीं हैं । आज स्कूल तक छात्रों को लाने ले जाने के लिए स्कूल बस, फास्ट फूड कल्चर, ऑनलाइन शॉपिंग आदि जैसी व्यवस्था को केवल सुविधाओं के विकास के तौर पर देखा जाए तो अच्छा है । इनके होने से हमारी संस्कृति में कोई बदलाव नहीं आया है, क्योंकि संस्कृति पूंजी से नहीं बदली जाती बल्कि संस्कृति में बदलाव सामाजिक सोच में बदलाव की देन है । बात अगर इस जनसंस्कृति को बचाने की है तो हम सबों को मिलकर परिवारिक स्तर से, समाजिक स्तर से, जाति, वर्ग, धर्म और संप्रदाय के स्तर से और व्यक्तिगत स्तर से सतत प्रयास की जरूरत है । साथ ही साथ मीडिया के हर माध्यम की भी जिम्मेदारी जनसंस्कृति को बचाने के क्षेत्र में अहम है । मीडिया के सभी तरह के प्रतिष्ठानों को समय-समय पर संस्कृति से जुडे कार्यक्रम को प्रचारित और प्रसारित करना चाहिए ताकि इस बाजारवाद से पनपती भागदौड़ भरी ज़िंदगी और नवसंस्कृति में हमारी अमूल्य संस्कृति न खो जाए । साथ हीं साथ यह भी ध्यान देने की आवश्यकता होगी कि सांस्कृतिक नवजागरण के इस दौर में हम अपनी सभ्यता और संस्कृति के कुछ महत्वपूर्ण पहलूओं को न छोड़े बल्कि उनको नई संस्कृति के साथ जोड़कर एक विविधता से परिपूर्ण संस्कृति का निर्माण करें और संस्कृतिक समरूपता के बीच हमारी सांस्कृतिक विविधता न खोने पाए ।


......................................................( गंगेश कुमार ठाकुर )


1 टिप्पणी:

  1. आशुतोष चौरसिया30 मार्च 2015 को 10:29 am

    बहुत ही उपयोगी जानकारी है यह मेरे लिए धन्यवाद

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