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गुरुवार, 7 सितंबर 2017

क्या पत्रकार भी बड़े और छोटे होते हैं ?

एक सवाल गौरी लंकेश की हत्या के बाद मेरे जेहन में बार-बार उठा रहा है कि क्या पत्रकारों की भी दो जाति होती है...क्या पत्रकार भी बड़े और छोटे होते हैं...क्या पत्रकारों की मौत पर विरोध दर्ज कराने का तरीका अलग-अलग हो सकता है...क्या पत्रकारों की भी अलग-अलग श्रेणी होती है...क्या संस्थानों और उनकी स्वयं की हैसियत के हिसाब से किसी पत्रकार के मौत पर विरोध का स्तर तय किया जाता है...क्या पत्रकारों को भी राजनीतिक संरक्षण की जरूरत है...नहीं तो फिर अलग-अलग जगहों पर मारे गए पत्रकारों की मौत के लिए विरोध के स्वर अलग-अलग क्यों

आपको बता दें कि गौरी लंकेश की हत्या के ठीक एक दिन बाद बिहार में पत्रकार पंकज मिश्रा को गोली मारी गई लेकिन उसके विरोध के लिए सड़कों पर ना तो लोग आए ना मीडिया के सूरमा अब आप समझ ही गए होंगे की मेरे अंदर पत्रकारों को लेकर और पत्रकारिता को लेकर इतने सारे सवाल कैसे खड़े हो गए।


आपको नीचे ऐसे पत्रकारों की सूची और नाम मैं दे रहा हूं जिनकी मौत की तारीखों को देखकर आप बता दीजिएगा की क्या इन पत्रकारों की मौत पर ऐसा ही विरोध हुआ था जैसा गौरी लंकेश के मारे जाने पर हुआ था। फिर वो अपने आप को पत्रकार कहती हैं जबकि उनके चाहने वाले पत्रकार ही उन्हें विचारधाराओं के नाम के साथ जोड़कर उसका पोषक बताते हैं। लेकिन विरोध तो विरोध है वह करेंगे... लेकिन उससे भी बेहतरीन बात यह है कि विरोध के लिए जो मंच वह तैयार करेंगे वहां पत्रकार नहीं बोलेंगे बल्कि नेता और नए युग के भारत के टुकड़े करने के नारे लगाने वाले नेता गौरी लंकेश की मौत पर लोगों का आह्वान करेंगे। एक पार्टी के उपाध्यक्ष प्रधानमंत्री से इस मौत पर कुछ नहीं बोलने को लेकर सवाल करने लगेंगे...जबकि उनको पता है कि जहां लोकेश की हत्या हुई उस राज्य में उनकी सरकार है। कानून और व्यवस्था की जिम्मेदारी राज्य की होती है। सभी मिलकर इस मौत में हिंदू, संघ और भगवा आतंकवाद जैसे शब्द जोड़कर अपना विरोध तो दर्ज करा रहे हैं। लेकिन किसी ने कभी तब क्यों नहीं आवाज उठाई जब और पत्रकारों को नक्सलियों के हाथों मारा गया...जिन नक्सलियों के ये वाम समर्थित पत्रकार सबसे बड़े पैरोकार बनते हैं...ये उनसे बेधड़क जंगल में मिल आते हैं...

आप सलेक्टिव हो सकते हैं...लेकिन पत्रकारों की अलग-अलग श्रेणी का निर्माण कर देना एक नई व्यवस्था के साथ विरोध के लिए भी मौत को अलग-अलग नजरिए से देखना फिर बुद्धिजीवी बन जाना...कहां की बुद्धिमतता है...आप विरोध करें तो सभी का करें समर्थन करें तो सभी का आप पत्रकार हैं ऐसे में आप किसी विशेष विचारदारा से बंधकर नहीं रह सकते...आप दक्षिणपंथी विचाराधार के पोषक हों...या फासिस्ट विचारधारा के...अब आप पत्रकार तो बिल्कुल नहीं हैं....बस आप एसी बंगलों ऑफिसों में रहकर काम करनेवाले और कैमरे के सामने दिखनेवाले किरदार मात्र हैं....

भारत में 1992 से लेकर अब तक 19 जाबाज पत्रकारों की जुबान को भ्रष्टाचार और अन्याय के विरूद्ध लड़ते वक्त हमेशा-हमेशा के लिए बंद कर दी गई। यही नहीं अब तक हजारों पत्रकारों पर जानलेवा हमले किये गये हैं। कई ऐसे मामले भी हैं जिन्हें प्रकाश में ही नहीं आने दिया गया। दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि पत्रकारों की निर्मम हत्या के मामले में अब तक न तो किसी हत्यारे को सजा ही मिली है और न ही किसी न्याय की गुंजाइश ही की जा सकती है। बता दें कि बीते साल में कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स ने 42 पन्नों की एक रिपोर्ट पेश कर यह खुलासा किया था कि भारत में रिपोर्टरों को काम के दौरान पूरी सुरक्षा अभी भी नहीं मिल पाती है। रिपोर्ट में खुलासा किया गया था कि 1992 के बाद से भारत में 27 ऐसे मामले दर्ज हुए हैं जब पत्रकारों का उनके काम के सिलसिले में क़त्ल किया गया। लेकिन किसी एक भी मामले में आरोपियों को सजा नहीं हो सकी है।

13 मई 2016 को सीवान में हिंदी दैनिक हिन्दुस्तान के पत्रकार राजदेव रंजन की गोली मारकर हत्या कर दी गई. ऑफिस से लौट रहे राजदेव को नजदीक से गोली मारी गई थी. इस मामले की जांच सीबीआई कर रही है.
मई 2015 में मध्य प्रदेश में व्यापम घोटाले की कवरेज करने गए आजतक के विशेष संवाददाता अक्षय सिंह की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई. अक्षय सिंह की झाबुआ के पास मेघनगर में मौत हुई. मौत के कारणों का अभी तक पता नहीं चल पाया है.
जून 2015 में मध्य प्रदेश में बालाघाट जिले में अपहृत पत्रकार संदीप कोठारी को जिंदा जला दिया गया. महाराष्ट्र में वर्धा के करीब स्थित एक खेत में उनका शव पाया गया.
साल 2015 में ही उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में पत्रकार जगेंद्र सिंह को जिंदा जला दिया गया. आरोप है कि जगेंद्र सिंह ने फेसबुक पर उत्तर प्रदेश के पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री राममूर्ति वर्मा के खिलाफ खबरें लिखी थीं.
साल 2013 में मुजफ्फरनगर दंगों के दौरान नेटवर्क18 के पत्रकार राजेश वर्मा की गोली लगने से मौत हो गई.
आंध्रप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार एमवीएन शंकर की 26 नवंबर 2014 को हत्या कर दी गई. एमवीएन आंध्र में तेल माफिया के खिलाफ लगातार खबरें लिख रहे थे.
27 मई 2014 को ओडिसा के स्थानीय टीवी चैनल के लिए स्ट्रिंगर तरुण कुमार की बड़ी बेरहमी से हत्या कर दी गई.
हिंदी दैनिक देशबंधु के पत्रकार साई रेड्डी की छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बीजापुर जिले में संदिग्ध हथियारबंद लोगों ने हत्या कर दी थी.
महाराष्ट्र के पत्रकार और लेखक नरेंद्र दाभोलकर की 20 अगस्त 2013 को मंदिर के सामने उन्हें बदमाशों ने गोलियों से भून डाला.
रीवा में मीडिया राज के रिपोर्टर राजेश मिश्रा की 1 मार्च 2012 को कुछ लोगों ने हत्या कर दी थी. राजेश का कसूर सिर्फ इतना था कि वो लोकल स्कूल में हो रही धांधली की कवरेज कर रहे थे.
मिड डे के मशहूर क्राइम रिपोर्टर ज्योतिर्मय डे की 11 जून 2011 को हत्या कर दी गई. वे अंडरवर्ल्ड से जुड़ी कई जानकारी जानते थे.
डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम के खिलाख आवाज बुलंद करने वाले पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की सिरसा में हत्या कर दी गई. 21 नवंबर 2002 को उनके दफ्तर में घुसकर कुछ लोगों ने उनको गोलियों से भून डाला.
छत्तीसगढ़ में रायपुर में मेडिकल की लापरवाही के कुछ मामलों की खबर जुटाने में लगे उमेश राजपूत को उस समय मार दिया गया जब वो अपने काम को अंजाम दे रहे थे।



समय                      नाम                मीडिया आउटलेट                  स्थान
27 फरवरी 1992  बक्षी तिरथ सिंह               हिंद समाज धुरी  पंजाब
27 फ़रवरी 1999  शिवानी भटनागर द इंडियन एक्सप्रेस     नई दिल्ली
13 मार्च 1999      इरफान हुसैन                   आउटलुक                   नई दिल्ली
10 अक्टूबर 1999                एन.ए. लालरुहु                    शान                मणिपुर
18 मार्च 2000      अधीर राय                        फ्रीलांस                  देवघर, झारखंड
31 जुलाई 2000   वी. सेल्वराज   नक्केरियन पेरामबलुर     तमिलनाडु
20 अगस्त 2000 थूनोजाजम ब्रजमानी सिंह    मणिपुर न्यूज़            इम्फालमणिपुर
21 नवंबर 2002   राम चंदर छत्रपति पूर्ण सच सिरसा        हरियाणा
7 सितंबर 2013   राजेश वर्मा                      आईबीएन 7   मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदेश
6 दिसंबर 2013        साई रेड्डी                       देशबंधु                  बीजापुर जिला
27 मई 2014        तारुन कुमार आचार्य    संबाद और कनक टीवी            खल्लीकोट गंजम जिला,ओडिशा
26 नवंबर 2014   एम. वी. एन. शंकर        आंध्र प्रभा चिलाकल्यिरिपेट         आंध्र प्रदेश
8 जून 2015           जगेंद्र सिंह                         फ्रीलांस           शाहजहांपुर उत्तर प्रदेश

5 सितंबर 2017   गौरी लंकेश                       कन्नड़ अखबार              बेंगलूरू

सोमवार, 15 जून 2015

डिग्री फर्जी तोमर की निकली, छवि बिगड़ गई केजरीवाल की


फर्जी डिग्री मामले में दिल्ली के कानून मंत्री जितेंद्र सिंह तोमर की गिरफ्तारी ने उपराज्यपाल एलजी और आम आदमी पार्टी सरकार के बीच जंग को और तेज कर दिया है। यही नहीं दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार और केंद्र के बीच भी तकरार तेज हो चुकी है। इससे इनकार नहीं किया जा सकता है कि फर्जी कानून और बीएससी डिग्रियों को लेकर कठघरे में खड़े कानून मंत्री का लगातार बचाव करते आ रहे अरविंद केजरीवाल की छवि भी धूमिल हो रही है। सभी दलों और राजनेताओं को सियासी शुचिता का पाठ पढ़ाने में जुटे केजरीवाल को यह जवाब तो देना होगा कि क्या वजह थी कि आरोप लगते ही तोमर को पद से नहीं हटाया गया। आखिर क्यों केजरीवाल अपने कानून मंत्री के बचाव पर इस कदर उतारू थे। वहीं इस पूरे विवाद में केंद्र को घसीटने की टीम केजरीवाल की कोशिशों को भी झटका लगा है। केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने काफी तार्किक तरीके से तोमर के खिलाफ दिल्ली पुलिस की कार्रवाई से खुद को अलग रखा है। जनता के बीच राजनाथ यह संदेश देने में कामयाब रहे कि ​गृहमंत्रालय गिरफ्तारी के आदेश पारित नहीं करता है। लिहाजा, तोमर की गिरफतारी को लेकर केंद्र को घसीटने की आप की कोशिश को राजनीति से प्ररित होने का साफ संदेश राजनाथ ने दे दिया। एक कहावत है कि ‘बिना आग के धुंआ नहीं उठता’। तोमर की डिग्रियों के फर्जी होने को लेकर अगर आरोप लगे हैं और कोर्ट ने उनकी पुलिस रिमांड भी दे दी है तो कहीं न कहीं यह निहितार्थ तो निकाले ही जा रहे हैं कि दाल में कुछ काला जरूर है।


वहीं पूर्व आप नेता योगेंद्र यादव की इस बात में भी दम है कि अगर तोमर की डिग्रियां फर्जी नहीं हैं तो उन्हें सार्वजनिक कर डंके की चोट पर आरोप नकारने में दिक्कत क्या है। उन्होंने कहा था कि कोर्ट के पीछे यह सारे मामले को क्यों छिपाया जा रहा है।  इस मामले में तोमर का बचाव कर रहे आप नेताओं में आत्मविश्वास का अभाव नजर आना भी फर्जी डिग्री आरोपों को पुख्ता कर रहा है। कुमार विश्वास से लेकर आशुतोष तक कोई भी आप नेता डिग्री सच होने को लेकर बयान देने से बचता ही नजर आ रहा है। डिग्री की सच्चाई पर सिर्फ इतना ही कहा जा रहा है कि यह तो कोर्ट तय करेगी कि सच्चे और झूठे दो तरह के दस्तावेजों में से सही कौन है। संदेश तो यही जा रहा है कि यह सारे आप नेता सिर्फ तोमर की गिरफ्तारी की प्रक्रिया में खामी निकाल रहे हैं और केंद्र के मंत्रियों स्मृति ईरानी और निहालचंद के मुद्दों को उछालकर अपने घर में मौजूदा कमियों को छिपा रहे हैं। एक बात और ध्यान देने की है कि मंगलवार को कोर्ट के रिमांड देने तक आशुतोष और कुमार विश्वास काफी आक्रामक तरीके से पुलिस के रवैये पर प्रहार कर रहे थे। लेकिन तोमर की रिमांड का फैसला आते ही उनके तेवर कुछ ढीले पड़ गए। रिमांड देने का मतलब यही निकाला जाने लगा कि कहीं न हीं कोर्ट दिल्ली पुलिस की तरफ से पेश किए गए साक्ष्यों से संतुष्ट है और इसके आधार पर आगे की जांच को जरूरी समझ रहा है। यही वजह है कि आप नेताओं ने अपनी आक्रामकता में कमी कर ली और शीर्ष न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाने की बात करने लगे।
उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया से पूछा गया तो उन्होंने तोमर के कॉलेज से दिए गए शपथपत्र को सामने कर कह दिया कि इसमें साफ है कि तोमर एलएलबी की तीनों कक्षाओं में उपस्थित रहे थे और परीक्षाओं में उत्तीर्ण भी हुए थे। लेकिन इससे पहले के राममनोहर लोहिया अवध यूनिवर्सिटी की बीएससी डिग्री के फर्जी होने को लेकर जो आरटीआई के दस्तावेज सामने आए थे उस पर सिसोदिया चुप रह गए थे। यह सारा कुछ यही संकेत देता है कि आप नेताओं के भरोसे में ही कमी है और शायद उन्हें समझ में आ रहा है कि उनका बचाव कमजोर पड़ रहा है।

यही वजह है कि इस पूरे घटनाक्रम को सारे आप नेता एलजी और केंद्र बनाम केजरीवाल सरकार का रंग देने में जुटे हुए हैं। डिग्री विवाद पर केंद्रित करने से ज्यादा आप नेता इसे भ्रष्टाचार पर केजरीवाल के वार का नतीजा बता रहे हैं। सिसोदिया ने कहा भी कि सीएनजी घोटाले की फाईल दोबारा खोले जाने की चर्चा के बाद ही तोमर विवाद को और हवा दी जा रही है। तोमर की गिरफ्तारी को भ्रष्टाचार के खिलाफ मोर्चा खोल रही केजरीवाल सरकार के विरुद्ध बदले की कार्रवाई निरूपित करने में भी आप नेता जुटे हुए हैं। एसीबी के मुखिया को बदले जाने को लेकर भी आप सरकार टकराव की मुद्रा में आ गई थी। कहा जाने लगा था कि एसीबी को अपने निष्ठावान के सुपुर्द कर एलजी भ्रष्टाचारियों को बचाने की कवायद में जुटे हैं। एक तरफ केजरीवाल निराधार आरोप लगाकार यह कोशिश करते हैं कि सभी उसका यकीन बिना सुबूत के कर लें,  वहीं दूसरी तरफ तोमर के खिलाफ आ रहे साक्ष्यों को नकारते हुए उनकी गिरफ्तारी को बदले की कार्रवाई बता रहे हैं।
बहरहाल, विवादों के बीच पिस रही दिल्ली की जनता तो समझ ही रही है कि केजरीवाल और उनकी टीम हर मसले पर सियासत चमकाने की कोशिश भी कर रही है। बड़ा सवाल यह है कि क्या इससे दिल्ली में कामकाज ठप नहीं पड़ गया है और जनता हलकान नहीं हो रही है। जवाब भी साफ है ​कि विवादों की वजह से जनता को परेशानी हो रही है और विकास की गति मंद हो रही है।
सवाल यह है कि केजरीवाल हर मुद्दे पर केंद्र से टकराव की नौबत क्यों ला रहे हैं। माना जा रहा है कि उनका निशाना आगे तक है। दिल्ली तो बस एक पड़ाव था और अब पंजाब और दूसरे सूबों में भी आप के पैर जमाने की कोशिश के तहत ही केजरीवाल यह संदेश दे रहे हैं कि वही अकेले भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग लड़ने वाले हैं और बाकी सभी इसे बढ़ावा देने वाले हैं। लेकिन तेामर प्रकरण पर केजरीवाल को सफाई देना मुश्किल होगा क्योंकि फर्जी डिग्री मामले में दिल्ली के मुख्यमंत्री उनका बचावकर खुद बुरी तरह फंस गए हैं। तोमर का जुर्म अगर साबित हुआ तो इसकी आंच केजरीवाल पर जरूर आएगी।
गंगेश कुमार ठाकुर

सोमवार, 16 दिसंबर 2013

बेहतरीन पंक्तियां


अलग से राग में गाना, तेरा अलग ही रंग में रंगना
यही दस्तूर है दुनिया का कहां इससे तुम अलग होगे
समय की तेजधारा में जो बहकर सीखते हो तुम
कहां तुम सीख पाते कभी साहिल पर खड़े होके
अजब की बात पर जो रोज तुम मुस्कुरा देते हो
कहां बातें कभी तुम मुस्कुरा के सोचते हो साहिब
सुखद एहसास की गर्मी ख्यालों में बसाकर तुम
दूसरों पर रोज हंसते हो कहां खुद पे कभी हंसते
तुम्हारी हर बात कितने ही सवालों का जवाब बनती
अगर दो बातें कभी तुम मुस्कुरा को जो कर देते

---गंगेश कुमार ठाकुर---

गुरुवार, 28 नवंबर 2013

‘आप’ ऐसे तो न थे?


70 साल के बुढ़े ने देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ जिस तरह से लोगों को जगाया वह सचमुच ऐसा मंजर था मानो जयप्रकाश नारायण की वह क्रांति फिर से भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में कई नए चेहरे और एक नई शुरुआत के तौर पर लाई गई हो। लेकिन धीरे-धीरे सत्ता की भूख ने इस आंदोलन को भी दो टूकड़ों में विभक्त कर दिया। आंदोलन की फसल के बीज बोए जाने से उसके लहलहाने तक इसे काटने वाले हाथ कम और उसकी देखभाल करनेवाले हाथ ज्यादा दिख रहे थे। देश की आवाम भी इसमें सहयोग अपना भरपूर सहयोग दे रही थी, लेकिन सत्ता की भूख ऐसी भूख है जिसने इस आंदोलन के दो ऐसे टूकड़े किए कि इस आंदोलन की नाव पर सवारी करनेवाले लोग अपने में ही आरोप-प्रत्यारोप का घिनौना खेल खेलने लगे। खैर मामला सुलझा, एक हिस्से ने धीरे-धीरे ही सही अपने आंदलन को जारी रखा और दूसरा हिस्सा सत्ता में दखल देने के ख्याल से पार्टी बनाकर लोगों के बीच मत मांगने पहुंच गया। जनता को भी लगने लगा था कि कहीं न कहीं दोनों ही का उद्देश्य सही है। अगर कुछ बदलना है तो खुद को सत्ता में लाना होगा और अगर लोगों को जगाना है तो आंदोलन की जरूरत पड़ेगी।
लेकिन समय-समय पर इस पार्टी ’आप’ पर जिस तरह के आरोप लगने लगे उसने जनता के दिल से इन लोगों के प्रति हमदर्दी को कम करना शुरू कर दिया। हालांकि फिर भी जनता बदलाव की ख्वाहिशमंद थी सो, कहीं न वह अपना विश्वास ’आप’ में दिखा रही थी। पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव जारी था। दिल्ली जहां लोकतंत्र की जमीन तैयार की जाती है, जहां से पूरे देश की सत्ता के महाभारत का बिगुल फूंका जाता है, जहां से लोकतंत्र निकलकर विदेशी गलियों में हलचल पैदा करता है और जहां के लोकतंत्र की चर्चा के बिना विश्व की राजनीतिक चर्चा अधूरी रहती है। ऐसी धरती पर 4 नवंबर को चुनाव होना तय किया गया। पार्टियां चुनाव प्रचार में जुट गईं। शब्दों की तलवारें गरजने लगी। आरोप-प्रत्यारोप का भाला चुभोया जाने लगा। जुबान से गोलियों की बौछारें होने लगी। यानि राजनीतिक अखाड़े में जुबानी खून-खराबा शुरु हो गया। ऐसे में ’आप’ ने दिल्ली विधानसभा में अपने सत्तर प्रत्याशियों को सभी सीटों पर खड़ा करने का फैसला किया और फैसला भी इसलिए क्योंकि समाज बदलना था, देश बदलना था, सत्ता का सेमीफाईनल यहां से जीतकर देश से भ्रष्टाचार मिटाने का संकल्प की अपनी तैयारी का प्रदर्शन करना था। रास्ता और सोच बिल्कुल सटीक, एकदम ईमानदार सोच। लेकिन इस सोच को तब विराम लगा जब एक मीडिया हाऊस ने ’आप’ के उम्मीदवारों की जुबां और सोच की हकीकत को अपने कैमरे में एक स्टिंग के तौर पर कैद किया। फिर क्या था ईमानदार नेतृत्व भी सवालों के घेरे में। अब आखिर जनता करे भी तो क्या? वो एक ईमानदार नेतृत्व की राह देख रही थी, तो यहां भी धोखा ही मिला। देश में सत्ता का समीकरण जब भी तैयार होता है उसके पहले इतने कीचड़ उछाले जाते हैं कि जनता का भी दामन उनमें से अपने लिए प्रतिनिधियों का चुनाव करने में दागदार हो जाता है।
‘आम आदमी पार्टी’ एक बार फिर विवादों में आ गई। इस बार एक स्टिंग ऑपरेशन में पार्टी के कई खास चेहरे फंस गए। इनमें से दो चेहरे हैं जो पार्टी के बिल्कुल खास थे आर के पुरम से प्रत्याशी शाजिया इल्मी और कुमार विश्वास। स्टिंग ऑपरेशनों में इन दोनों पर धन लेने और धन लेने के लिए तैयार होने का आरोप लगाया गया। शाजिया पर आरोप है कि उन्होंने पार्टी की जगह वॉलेंटियर्स को कच्ची रसीदों पर चंदा देने की बात कही जबकि कुमार विश्वास पर आरोप लगे हैं कि उन्होंने शो के लिए पैसे लिए और पेमेंट चेक की जगह कैश में लिया। मीडिया सरकार नाम की संस्था ने शाजिया इल्मी और कुमार विश्वास के साथ-साथ आप पार्टी के कुछ और नेताओं का स्टिंग ऑपरेशन किया। हालांकि आप पार्टी ने मीडिया सरकार के इस स्टिंग को बेबुनियाद और गलत बताया है। मीडिया सरकार ने आप के सात और उम्मीदवारों का स्टिंग ऑपरेशन किया है। इस स्टिंग में कोंडली से आप के उम्मीदवार मनोज कुमार, संगम विहार के उम्मीदवार दिनेश मोहनिया, ओखला के उम्मीदवार इरफान उल्लाह खान, रोहतास नगर के उम्मीदवार मुकेश हुड्डा, पालम से आप उम्मीदवार भावना गौर, देवली के आप उम्मीदवार प्रकाश शामिल हैं। मीडिया सरकार ने दावा किया है कि आप पार्टी के ये नेता कायदे कानून को ताक पर रखकर पैसे के बदले हर उस काम के लिए तैयार हो गये थे जिसका आरोप ये दूसरे नेताओं पर लगाते रहते हैं। अब हकीकत क्या है इसका फैसला तो आप की तरफ से पार्टी के द्वारा दिए जानेवाले बयान पर ही निर्भर करता है। पार्टी के नेता अऱविंद केजरीवाल ने कहा है कि वो पूरा स्टिंग देखने के बाद हीं इस पर कोई फैसला करेंगे या बयान देंगे। हलांकि आप के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने कहा कि भ्रष्टाचार से कोई समझौता नहीं होगा और किसी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा। उन्होंने इस स्टिंग को पार्टी के खिलाफ साजिश करार दिया। वहीं स्टिंग ऑपरेशन की चपेट में आई ‘आप’ प्रत्याशी शाजिया इल्मी ने विधानसभा चुनाव से अपनी उम्मीदवारी वापस लेने की पेशकश की है। उनका कहना है कि वह नहीं चाहतीं कि उनकी वजह से पार्टी की बेदाग छवि को कोई नुकसान पहुंचे। जब तक इस पूरे मामले में वह पाक-साफ नहीं करार दी जातीं, वह चुनाव नहीं लड़ेंगीं। इसके पहले कांग्रेस और भाजपा भी एक वीडियो के मुद्दे पर अरविंद केजरीवाल की अगुवाई वाली आम आदमी पार्टी (आप) पर निशाना साधा चुकी है, जिसमें दिखाया गया है कि जनलोकपाल विधेयक की खातिर किए गए आंदोलन के दौरान इकट्ठा किए गए धन के आप द्वारा कथित गलत इस्तेमाल पर अन्ना हजारे अपनी नाराजगी जाहिर कर रहे हैं। हालांकि, अन्ना हजारे ने इस पर सफाई दी है कि केजरीवाल और उनके बीच किसी तरह का झगड़ा नहीं है़, सिर्फ मतभेद हैं, जिन्हें दूर किया जा सकता है। खैर मामले की हकीकत कुछ भी हो लेकिन जनता के लिए भरोसे का एक नाम बन गई ‘आप’ के लिए जनता तो बस इतना ही पुछती है कि ‘आप’ ऐसे तो न थे?

योग्यता नहीं परिवार से सीखकर चलता है भारतीय लोकतंत्र

पंद्रहवें लोकसभा चुनावों के बाद एक नारा चारो तरफ़ सुनाई देने लगा था। लगभग हर राजनीतिक दल यह कहने लगे थे कि अब युवा भारत का समय है और राजनीती में युवाओं को लाया जाना चाहिए और लाया जाएग। उस बार का लोकसभा चुनाव संम्पन्न हो गया और अच्छी संख्या में युवा संसद चुनकर संसद तक आ पहुंचे। इसके बाद शुरु हुआ दौर हर पार्टी द्वारा युवाओं को आगे लाने का। लेकिन जब ये युवा ब्रिगेड राजनीति के अखाडे से निकलकर जनता के सामने आई तो लगा यह युवा राजनीति नहीं ये तो राजतंत्र की वंशवाद परंपरा का लोकतांत्रिक रूप है। जब हमने युवा लोकतंत्र को ध्यान से देखा तो लगने लगा मानो वास्तविक लोकतंत्र परिवार की परंपरा को आगे चलाने का ही दूसरा नाम है। राहुल गाँधी , अखिलेश यादव, धर्मेन्द्र यादव, प्रिया दत्त, सचिन पायलट, जीतेंद्र प्रसाद ऐसे ही कई नाम इस फेहरिस्त में है जो राजनीति में सत्ता को नहीं अपने पूर्वजों की विरासत को संभालने आए हैं।
दरअसल यहां प्रश्न इनकी योग्यता या अयोग्यता का न होकर इनको राजनीति में तबज्जो और मौका दिए जाने को लेकर है। सवाल यहां लोकतंत्र के उस महान उद्देश्य का है जो शासन में जनता की अधिक से अधिक सहभागिता चाहता है। नेहरू-गांधी परिवार ने तो ये मान लिया है कि कांग्रेस की संपूर्ण सत्ता को इन्हीं का परिवार संभाल सकता है। कांग्रेस के बाकी नेता अब इस परिवार के मंत्री बन गए हैं ,जिनका अलग होना उनके अपने अस्तित्व को मिटा लेना या संकट की स्थिति में डाल लेना है। कमोवेश यह बात लगभग हर पार्टी में है, चाहे वह राष्ट्रीय स्तर की पार्टी हो या क्षेत्रीय स्तर की। राजनीति में इस तरह का परिवारवाद ये सामान्य मुद्दा नहीं बल्कि गहन सोच का विषय है कि आखिर जिस राजशाही, परिवारवाद और सामंतवाद से लड़कर हमने लोकतंत्र को स्थापित किया है वो  इस तरह से एक सफल लोकतंत्र बन पाएगा फिर लोकतंत्र और राजतंत्र के बीच अंतर क्या रह जाएगा। बस भोली-भाली जनता के मतदान का अंतर ही तो होगा राजतंत्र और लोकतंत्र के बीच। वो भी ऐसा मतदान जिसमें जीतने वाला कोई भी राजा किसी न किसी परिवार से संबंध रखता हो। आमजन के लिए लोकतंत्र में केवल वोट देने का ही काम नहीं है , बल्कि उनमें योग्य व्यक्तियों को आगे आकर जनता का प्रतिनिधित्व करने की भी क्षमता है लेकिन उस क्षमता का महत्व इस लोकतंत्र की परिवारवादी व्यवस्था में मिलकर समाप्त हो जाता है। ऐसे में लोकतंत्र को परिवारवाद की राजनीति के सहारे उसी तरह जिंदा रखा गया है जैसे वेंटिलेसन पर किसी मनुष्य को जिंदा रखा जाता है। डॉक्टर अपने बेटे को डॉक्टर बना दे, इंजीनियर अपने बेटे को इंजीनियर बना दे  या अध्यापक का बेटा अध्यापक बन जाये तो इससे किसी को कोई आपत्ति नहीं होगी ना ही किसी को सार्वजनिक रूप से इससे नुकसान होगा। लेकिन अगर किसी राजनीतिक नेता का बेटा या बेटी राजनीति में आ जाए तो सबको आपत्ति होगी क्योंकि देश में राजनीति एक व्यवसाय का रूप ले चुकी है जिस व्यवसाय के लिए योग्यता नहीं परिवार द्वार सिखाया गया राजनीति का पाठ जरूरी है। पूरे विश्व के लोकतांत्रिक इतिहास में भारत एक ऐसा देश है, जहां राजनीति में परिवारवाद की जड़ें गहरी धंसी हुई है। यहां एक ही परिवार के कई व्यक्ति लंबे समय से प्रधानमंत्री और केन्द्रीय राजनीति की धुरी रहे हैं। आजादी के तुरंत बाद शुरू हुई वंशवाद की यह अलोकतांत्रिक परंपरा अब काफी मजबूत रुप ले चुकी है। राष्ट्रीय राजनीति के साथ-साथ राज्य और स्थानीय स्तर पर इसकी जड़ें इतनी जम चुकी है कि देश का प्रजातंत्र परिवारतंत्र नजर आता है। इस परिवारतंत्र को कितना लोकतांत्रिक कहा जा सकता है, यह सवाल दिनों दिन बढ़ता जा रहा है।
जवाहरलाल नेहरू से होते हुए इंदिरा गाँधी, संजय गांधी, राजीव गांधी, मेनका गांधी, सोनिया गांधी, प्रियंका गांधी, राहुल गांधी, वरुण गांधी जिस तरह से पारिवारिक सत्ता का फायदा लेते आए हैं और देश की राजनीति में अपनी खासी ठसक रखते हैं वो देश क्या विदेशों में भी किसी से छूपी नहीं है। महाराष्ट्र में ठाकरे परिवार का भी हाल राजनीति में कुछ ऐसा हा रहा है। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायमसिंह के परिवार के लगभग बीस छोटे बड़े सदस्य केन्द्र या उत्तर प्रदेश की कुर्सियों पर विराजमान हैं। पंजाब में अकाली दल के प्रकाशसिंह बादल के एक दर्जन पारिवारिक लोग कुर्सियों पर काबिज हैं। हरियाणा में स्वर्गीय देवीलाल के पुत्र चौटाला जी और उनके बेटे राजनीति में हैं। कश्मीर में स्व. शेख अब्दुला के बाद उनके बेटे फारूख अब्दुला और उनके भी बेटे उमर अब्दुला क्रमश: केन्द्र व राज्य में काबिज है। कश्मीर में ही विरोधी नेता महबूबा मुफ्ती अपने पिता भूतपूर्व केन्द्रीय गृह मन्त्री की विरासत की मालकिन हैं। हिमांचल के भारतीय जनता पार्टी के वर्तमान मुख्यमंत्री के पुत्र अनुराग ठाकुर राष्ट्रीय युवा मोर्चा संभाल रहे हैं। हरियाणा के दो भूतपूर्व बड़े नेता चौधरी बंशीलाल व भजनलाल के वंशज राजनीति में सक्रिय हैं। बिहार के राजद के बड़े नेता लालू प्रसाद ने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को चूल्हे से सीधे मुख्यमन्त्री बनाया था। उनके दो साले भी राजनीति मे अग्रणीय हैं। स्वर्गीय लालबहादुर शास्त्री जी के पुत्र, गोविन्दवल्लभ पन्त के पुत्र-पौत्र, मध्यप्रदेश के शुक्ला बन्धु अपने पिता की विरासत को लंबे समय तक संभालते रहे। उत्तराखंड के वर्तमान मुख्यमन्त्री अपने पिता हेमवतीनंदन की लीक पर हैं, उनकी बहन भी उत्तरप्रदेश में कॉग्रेस की कमान सम्हाले हुई हैं। चौधरी चरणसिंह के पुत्र एवं पौत्र उनके बताए मार्ग पर चल रहे हैं। वर्तमान लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार, बाबू जगजीवनराम की बेटी हैं। हारे हुए राष्ट्रपति उम्मीदवार संगमा लोकसभा के अध्यक्ष रह चुके हैं। बेटे को आसाम मे राज्य विधान सभा में और बेटी को लोकसभा में स्थान दिला कर आगे की राह तक रहे हैं। मध्यप्रदेश के राज घराने वाले सिंधिया परिवार की पीढ़ियां राजनीति की अग्रिम पंक्ति में सक्रिय हैं। दक्षिण में तमिलनाडू में करुनानिधि पुत्र एवं पुत्री, भतीजे व अन्य रिश्तेदारों के साथ राजनीति का सुख ले रहे हैं। केरल में स्वर्गीय करुणाकरण ने पुत्र मोह में बहुत खेल किया, और पार्टी से विद्रोह किया। कर्नाटक में स्वनामधन्य हरदनहल्ली देवेगौड़ा के बेटे का मुख्यमंत्री बनना और हटाया जाना ज्यादा पुराना मामला नहीं है। आन्ध्र में फिल्मों से आये राजनेता/मुख्यमन्त्री एन टी रामा राव की विरासत में पत्नी लक्ष्मी और दामाद चंद्रबाबू नायडू के राजकाज की बातें अब भी लोगों को याद हैं। आंध्र में ही पूर्व मुख्यमन्त्री राजशेखर रेड्डी के पुत्र जगन के हक की लड़ाई केवल कुर्सियों के लिए चली है। झारखंड में शिबूसोरेन का व उनके बेटे का राजनीतिक दांवपेंच सिर्फ कुर्सी के लिए चलता रहा है। एनसीपी नेता शरद पवार की बेटी राज्यसभा में और भतीजा विधान सभा में उनके आदर्शों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। महिला आयोग की वर्तमान अध्यक्षा ममता शर्मा के ससुर लंबे समय तक राजस्थान में कई विभागों के मन्त्री रहे चुके हैं। राजस्थान के वर्तमान गृहमंत्री शांति धारीवाल के पिता भी अपने समय के बड़े नेता थे। इस प्रकार के कई राजनीतिकों के बेटे, भतीजे और भाई अपने बाप या दादा की वसीयत को सम्हाले हुए हैं। दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित, हरीश रावत, यशपाल आर्य, भूपेंद्रसिंह हुड्डा, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमन्त्री कल्याणसिंह, इन सबके बेटे भी इसी राह पर हैं।
भारतीय राजनीति में अगर परिवारवाद का विरोध करने वाले कोई राजनेता थे, तो वो थे राम मनोहर लोहिया। लोहिया का मानना था की राजनीति में वंशवाद नहीं होना चाहिए जिसमें नेतृत्व की क्षमता हो वो आगे बढ कर राजनीति को थाम ले साथ ही जनता के हित में काम करे ना की अपने और अपने परिवार के लिए। भारत में लोकतंत्र के बदलते इस मिजाज़ को लोग भले ही हलके तौर पर ले रहे हों या इसके दुष्परिणामों की तरफ निगाह ना डाल रहे हों , पर यकीनन ये ऐसा खतरा है जो लोकतंत्र की पुख्ता इमारत को विषैला बना देगा , क्योंकि परिवार-वाद का कहर बड़ी तेज़ी से इसमें ज़हर बो रहा है ! वंशवाद अगर इसी तरह भारतीय राजनीति में अपनी जड़े जमाता रहा तो आम आदमी का राजनीति में प्रवेश करने का सपना सपना बनकर रह जायेगा।

मंगलवार, 26 नवंबर 2013

सुशासन में भी कुपोषण के शिकार बुनकर

http://www.youtube.com/watch?v=au2fHPvooW0
http://www.boljantabol.com/hindi/silk-business-in-bhagalpur/
सिल्क कहीं इतिहास की किताबों में तो नहीं पढ़ा जाएगा ?


दिल्ली के प्रगति मैदान में लगे विश्व व्यापार मेले में जब मैं अपनी टीम के साथ पहुंचा तो मेरी कौतुहल भरी नजरें बिहार भवन की तरफ थी कि शायद इस बार कुछ नया देखने को मिल जाए। अनायास ही मेरे कदम बिहार भवन की तरफ मुड़ गए अंदर प्रवेश किया तो लोगों के मुंह से तारीफों के पुल बांधे जा रहे थे। हृदय गदगद हो उठा लोग वहां की संस्कृति और खासकर भागलपुर के सिल्क की तारीफ करते नहीं अघा रहे थे। झट मैं भी अपनी टीम के साथ उसी स्टॉल पर पहुंच गया जो भागलपुर के बुनकरों द्वारा लगाया गया था। यकीन मानिए सारी खुशी दो मिनट में टांय-टांय फिस्स हो गई। बुनकरों के चेहरे पर परेशानी और उलझन के भाव स्पष्ट नजर आ रहे थे। 
भागलपुर बिहार का वह जिला जिसे भारत ही नहीं संपूर्ण विश्व सिल्क नगरी के नाम से जानता है। आज ही नहीं इतिहास के पन्नों को पलट कर देखें तो महाभारत के काल से ही कर्ण की राजधानी रह चुका यह जिला आज भी अंग प्रदेश का हिस्सा है। इसीलिए इस जिले और इसके आसपास के जिले में बोली जाने वाली भाषा अंगिका है। भागलपुर का अर्थ है सौभाग्य का शहर। दुनिया के बेहतरीन सिल्क उत्पादक होने के कारण भागलपुर को सिल्क सिटी के रूप में भी जाना जाता है। यह पटना से 220 किमी पूर्व में और कोलकाता से 410 किलोमीटर उत्तर पश्चिम में स्थित गंगा नदी के तट पर ऐतिहासिक महत्व का एक शहर है। भागलपुर बिहार में पटना और गया के बाद तीसरा सबसे बड़ा शहर है। इस शहर में रेशम उद्योग सैकड़ों वर्ष पुराना है और रेशम उत्पादक कई पीढ़ियों से रेशम उत्पादन करते आ रहें है।
यह वही जिला है जहां विक्रमशिला विश्वविद्यालय था जो एक समय विश्व के खासम-खास शिक्षण संस्थानों में से एक था। इसी जिले के सुलतानगंज प्रखंड से हर साल सावन के महीने में करोड़ों देशी और विदेशी कॉवरिये जल लेकर झारखंड में अवस्थित बाबा रावणेश्वर बैद्यनाथ धाम की यात्रा करते हैं। इसी शहर में एक मोहल्ला है चंपानगर जहां बिहुला और विषहरी की कहानी आज भी लोगों की जुबान पर है। भारतीय राजनीति में भी इस जिले ने अहम किरदार निभाया है और स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई से लेकर आज तक इस जिले की सक्रिय दखल भारतीय राजनीति में रही है। कभी कांग्रेस का गढ़ माना जानेवाला यह जिला पिछले कई सालों से भाजपा और उनकी सहयोगी पार्टी की झोली में रहा है। चाहे वह लोकसभा हो या विधानसभा की सीट। इतिहास की किताबों में इतनी सशक्त छवि रखने वाला यह जिला दो कारणों से आज भी लोगों के जेहन में अपने आप को जिंदा रखे हुए है। इसमें से एक तो आजादी के बाद का वो दर्दनाक मंजर है जिसने 1989 में इस शहर को मानो बंजर ही कर दिया था। किसी तरह से इस शहर ने अपना दिल मजबूत कर फिर से अपने आप को हरा भरा किया तो शहर की गलियों से उसकी अपनी पहचान गायब होने लगी। यानि भागलपुर का धाराशायी होता सिल्क उद्योग जिस पर बिहार सरकार की निगाह कभी नहीं पड़ी। सरकार के बड़े-बड़े वादे भी इस उद्योग को संभालने और बचाने में झूठे और बेमानी साबित होते रहे। बुनकरों ने इस उद्योग को आज भी अपने दम पर अपने कंधों पर जिंदा रखा है। गंगा की कल-कल, निश्छल और अविरल बहती धारा के किनारे बसे इस शहर में हिंदु और मुस्लिम दोनों ही जाति के लोग बड़े शान से रहते हैं। यह गंगा का वही क्षेत्र है जहां गंगा में डाल्फिन मछलियां पाई जाती हैं। सरकार के उदासिन रवैये के चलते गंगा से अब इस जीव के समाप्ती की भी शुरुआत हो गई है।
आए दिन सिल्क सिटी बिजली संकट से परेशान है। अधिकारी भी ऊपर से ही बिजली न मिलने की दुहाई दे रहे हैं। लोगों की रातें काली हो रही हैं। इस शहर में बिजली संकट आपूर्ति घटने से ज्यादा बिजली की सप्लाई नियोजित तरीके से न होने के कारण गहराता है। इसी संकट ने हैंडलूम चलाने वाले बुनकरों के लिए भी समस्या खड़ी कर रखी है। बुनकरों को बिजली की अनुपलब्धता के चलते सिल्क का धागा तैयार करने और सिल्क के कपड़े तैयार करने में जिस तरह की असुविधा होती है वह तो बुनकर ही जानते हैं।
यह शहर बिना सड़क के बिहार की उपराजधानी बनने का सपना देख रहा है । शहर की लाइफ लाइन मानी जाने वाली एनएच-80 सहित लगभग सभी प्रमुख सड़कें जर्जर और खस्ताहाल हैं। इन सड़कों के निर्माण व मरम्मत पर पिछले कई साल में लाखों रुपये खर्च हो चुके हैं, पर स्थिति जस की तस बनी हुई है। शहर में सिल्क उद्योगों के बढ़ने में आनेवाली एक मुख्य बाधा यह भी है।
यह वही शहर है जहां के राजा कर्ण ने अपना सबकुछ दान कर अपने दानवीर होने का प्रमाण दिया था। आज उसी शहर की जमीन विकास के लिए अपने राज्य के मुखिया का मुंह ताकता रहता है। पिछले कई सालों से बिजली की खराब स्थिति, सिल्क के कारीगरों की दुर्दशा, लचर ट्रैफिक व्यवस्था, बाइपास, रूक-रूक कर घिसटती चलती विमान सेवा, जर्जर एनएच, हाइकोर्ट की बेंच का गठन नहीं हो पाना, कहलगांव में फूड पार्क, अस्पताल, पर्यटन, मंजूषा चित्रकला आदि क्षेत्रों में विकास आज भी सपना बनकर रह गया है। कहलगांव की बिजली से जहां कई राज्य रौशन होते हैं वहीं भागलपुर में अंधेरा अपनी चरम पर है। पर्यटन के क्षेत्र में अपार संभावनाओं के बावजूद अभी तक विक्रमशिला विश्व विद्यालय को ही उसका उचित सम्मान नहीं मिल सका है। मंदार, अजगैबीनाथ और आसपास के जैन तीर्थ स्थलों को यदि विकसित किया जाए तो अंग के लोग अपनी विरासत पर गर्व करेंगे। यह शहर है जहां बाला लखिंदर, चांदो सौदागर, सती बिहुला और मंशा देवी की कीर्ति आज भी गाई जाती है। इसी के आधार पर आधारित है मंजूषा चित्रकला। यानि दानवीर कर्ण की भूमि को आज दान की नहीं, सरकार से उसके हक की मांग है।
दिल्ली के प्रगति मैदान में लगे विश्व व्यापार मेले में जब मैं अपनी टीम के साथ पहुंचा तो मेरी कौतुहल भरी नजरें बिहार भवन की तरफ थी कि शायद इस बार कुछ नया देखने को मिल जाए। अनायास ही मेरे कदम बिहार भवन की तरफ मुड़ गए अंदर प्रवेश किया तो लोगों के मुंह से तारीफों के पुल बांधे जा रहे थे। हृदय गदगद हो उठा लोग वहां की संस्कृति और खासकर भागलपुर के सिल्क की तारीफ करते नहीं अघा रहे थे। झट मैं भी अपनी टीम के साथ उसी स्टॉल पर पहुंच गया जो भागलपुर के बुनकरों द्वारा लगाया गया था। यकीन मानिए सारी खुशी दो मिनट में टांय-टांय फिस्स हो गई। बुनकरों के चेहरे पर परेशानी और उलझन के भाव स्पष्ट नजर आ रहे थे। वो सहमे थे और शायद सिल्क के भविष्य और अपने रोजगार को लेकर ज्यादा चिंतित थे। इसी क्रम में मेरी बाचतीत एक सिल्क के व्यापारी से हुई जब उसकी समस्या सुनी तो पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। सचमुच मैं भी महसूस करने लगा की यही हाल रहा तो जल्द ही सिल्क इतिहास की किताबों में पठनीय अध्याय बनकर रह जाएगा। मायूस था सो सोचा सरकार तक उनकी बात पहुंचा दूं। सो, सबसे सशक्त माध्यम मुझे यही लगा, इसलिए आपलोगों से साझा कर रहा हूं। पहले वीडियो पर गौर फरमाईए फिर मेरे लेख पर। सचमुच आप भी सरकारी तंत्र और अफसरशाही के रवैये से इतना आहत हो जाएंगे कि उन्हें कोसे बिना नहीं रह पाएंगे। हालांकि हमारी जरूरत कोसने की नहीं बल्कि इस उद्योग को बचाने, संभालने और पोसने के लिए प्रयास करने की है। यानि बिहार में सुशासन भी भागलपुर के बुनकरों को कुपोषण से बचाने में नाकाम रहा ऐसे में अब उम्मीद की किरण बस हम और आप हैं। चलिए मिलकर एक सम्मलित प्रयास करते हैं ताकि एक बार फिर से इस उद्योग के सूखती जड़ में अमृत डाल पाएं।

गुरुवार, 21 नवंबर 2013

पोस्ट बॉक्स नंबर पर भी दो आर.टी.आई. के तहत सूचना


सूचना जब परोसने लगी मौत का खौफ तो पोस्ट बॉक्स नंबर पर लग गई अदालती मुहर

सरकार ने संविधान से पारित कराकर सूचना के अधिकार का उपयोग करने की आजादी तो लोगों को दे दी लेकिन लोगों की सुरक्षा इस कानून के इस्तेमाल की शुरुआत से ही अहम मुद्दा बनने लगा। 2005 से लेकर आजतक कई सामाजिक कार्यकर्ता जो सूचना के इस्तेमाल का उपयोग कर सरकारी और अफसरशाही भ्रष्टाचार को उजागर करने की कोशिश में लगे थे वो मौत के आगोश में चले गए। यानि सूचना मांगी और मौत मिली। सूचना के अधिकार कानून को देश के लोग मौत का हथियार कानून भी कहने लगे तो ज्यादा आश्चर्य की बात नहीं होगी क्योंकि सूचना मांगने वाला सत्तासिनों और अफसरशाहों से ज्यादा ताकतवर नहीं हो सकता खासकर उनसे जो भ्रष्ट हैं ऐसे में सूचना मांगना यानि अपनी हत्या के लिए खुद हथियार आंगने के बराबर ही तो हो गया है।





सूचना का अधिकार अधिनियम को भारत के संसद द्वारा जब जून, 2005 को इसके कानून बनने के 120 वें दिन बाद 12 अक्तूबर, 2005 को लागू किया गया तब इसका एक ही उद्देश्य था। वह था देश की आवाम तक सूचना का आदान-प्रदान करना जो वो चाहते हैं। भारत में भ्रटाचार को रोकने और समाप्त करने के लिये इसे बहुत ही प्रभावी कदम बताया गया। इस नियम के द्वारा भारत के सभी नागरिकों को सरकारी आंकड़ों, सूचनाओं और प्रपत्रों में दर्ज सूचना को देखने और उसे प्राप्त करने का अधिकार प्रदान किया गया। संविधान के अनुच्छेद 19(1) के तहत सूचना का अधिकार भारतीय नागरिकों के मौलिक अधिकारों का एक भाग है। अनुच्छेद 19(1) के अनुसार प्रत्येक नागरिक को बोलने व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है। इसी को ध्यान में रखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक आदेश में कहा था कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है यहां जनता मालिक है। इसलिए लोगों को यह जानने का पूरा अधिकार है कि सरकारें जो उनकी सेवा के लिए हैं, वह क्या कर रहीं हैं? यानि नागरिकों के पास यह जानने का अधिकार है कि उनका धन किस प्रकार खर्च हो रहा है या सरकार उनके हित के लिए किस तरह के काम कर रही है जो समाज और देश के हित में हो।
सरकार ने संविधान से पारित कराकर सूचना के अधिकार का उपयोग करने की आजादी तो लोगों को दे दी लेकिन लोगों की सुरक्षा इस कानून के इस्तेमाल की शुरुआत से ही अहम मुद्दा बनने लगा। 2005 से लेकर आजतक कई सामाजिक कार्यकर्ता जो सूचना के इस्तेमाल का उपयोग कर सरकारी और अफसरशाही भ्रष्टाचार को उजागर करने की कोशिश में लगे थे वो मौत के आगोश में चले गए। यानि सूचना मांगी और मौत मिली। सूचना के अधिकार कानून को देश के लोग मौत का हथियार कानून भी कहने लगे तो ज्यादा आश्चर्य की बात नहीं होगी क्योंकि सूचना मांगने वाला सत्तासिनों और अफसरशाहों से ज्यादा ताकतवर नहीं हो सकता खासकर उनसे जो भ्रष्ट हैं ऐसे में सूचना मांगना यानि अपनी हत्या के लिए खुद हथियार आंगने के बराबर ही तो हो गया है। आंकड़ों की माने तो वर्ष 2010 के बाद से 23 आर.टी.आई. कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है यह अपने आप में हैरत कर देनेवाली संख्या है। लोगों ने इस कानून का उपयोग करने में अपनी जान को जोखिम में डालने की हिम्मत नहीं की और जिन्होंने की उनका भी हाल कुछ ज्यादा अच्छा नहीं है। बड़े सामाजिक कार्यकर्ता या तो मार दिए जाते हैं या आरोपों के घेरे में फांस दिए जाते हैं यह सूचना की ताकत नहीं भ्रष्टाचार का बल बोलता है। सरकार और न्यायालय ने ऐसे कार्यकर्ताओं की सुरक्षा को लेकर कई बार चिंता जताई। न्यायालय की तरफ से इनकी सुरक्षा के लिए सरकार द्वार उचित व्यवस्था किए जाने के आदेश भा जारी किए गए लेकिन इन सब से होता क्या है एक कहावत है कि बिल्ली को दूध की रखवाली का जिम्मा सौंपा जाए तो वह पतीला चाट ही जाएगी। कुछ ऐसी ही व्यवस्था ने इस कानून को भी संदेहास्पद बना रखा था आप सुरक्षा की जिम्मेवारी उस पर सौंप रहे हैं जो कहीं न कहीं प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से इस भ्रष्टतंत्र का हिस्सा हैं ऐसे में वो अपने या अपने भ्रष्ट परिवार के बाकी भाईयों के गले में फंदा तो पड़ने नहीं देंगे। रही बात आप जिस को अपने भ्रष्टाचार की सूचना देने जा रहे हैं उस आवेदक का पूरा ब्यौरा आपके पास मौजुद है यानि आपको इसके सफाये के लिए पहले से पूरी सूचना दे दी गई है या तो आप सूचना इन्हें दें या अपनी सूचना से बचने के लिए इन्हें किसी अखबार की खबर बनवा दें। इस कानून के इसी परेशानी को देखते हुए कलकत्ता उच्च न्यायालय में अभिषेक गोयनका ने याचिका दायर कर कहा था कि आर.टी.आई. के तहत जानकारी मांगने वाले आवेदक की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए आवेदक की व्यक्तिगत जानकारी मांगे जाने पर रोक लगनी चाहिए। अदालत को भी गोयनका की बातों में दम लगा और अपने एक महत्वपूर्ण आदेश में कलकत्ता हाई कोर्ट ने कहा है की आर.टी.आई. के तहत जानकारी लेने के लिए अपनी व्यक्तिगत जानकारी देने की जरूरत नहीं है और आवेदक सिर्फ पोस्ट बॉक्स नंबर देकर भी जानकारी हासिल कर सकता है | याचिका में कहा गया था की वर्ष 2010 के बाद से 23 आर.टी.आई. कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है, इसिलए आवेदक को पोस्ट बॉक्स नंबर के जरिये भी जानकारी मांगने की छूट मिलनी चाहिए| चीफ जस्टिस ए.के. बनर्जी और जस्टिस डा. बास्क की बैंच ने याचिका पर सुनवाई करते हुए आदेश दिया की अगर आवेदक पते की जगह सिर्फ पोस्ट बॉक्स नंबर भी देता है तो उसको जानकारी उपलब्ध करायी जाए| बैंच ने कहा की आवेदक की सुरक्षा काफी महत्वपूर्ण विषय है और इसके लिए यह कदम उठाना आवश्यक है | कोर्ट ने अपने आदेश को केंद्र सरकार को भेजने का आदेश देते हुए कहा कि सरकार इस आदेश की प्रति और सूचना सभी विभागों को भी उपलब्ध करा दे |न्यायालय का यह फैसला सच में उनलोगों के लिए राहत लेकर आया है जो आजतक भ्रष्ट तंत्र की चक्की के दोनों पाटों के बीच पीसते आए हैं और जिंदगी के ड़र और मौत के खौफ ने उनके हाथ सूचना मांगने के लिए कलम उठाने से पहले ही बांध कर रख दिए हैं। अगर सरकार ने न्यायालय के इस फैसले को लागू कर दिया तो कई हाथ बंधन मुक्त हो जाएंगे और फिर भ्रष्टता की चरमता में कुछ तो विराम जरूर लगेगा।