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शनिवार, 15 अक्तूबर 2011

दो पन्नों के मध्य


आज कई वर्षों के बाद
मेरे कमरे की सफाई के लिए
कहने लगी थी माँ मुझसे
सुबह उठकर लग गया था
अपने कमरे के छज्जे से
कापियॉ, किताबें और ढेरों पुराने सामान
उतारकर कमरे की फर्श पर
फैला दिया था मैंने
उन सामानों में से
जरूरत के सामान
अलग कर रहा था
तभी अचानक
एक किताब के चंद पन्ने
पंखे की हवा से
उलटने पलटने लगे थे
अटक कर रह गयी थी
मेरी नज़र किताब के
उन दो पन्नों के मध्य
चिपके हुए गुलाब के फूल पर
गुलाब की इन सूखी पत्तियों ने
किसी के प्यार को
मेरे अंदर हरा कर दिया था






याद आ रहा था मुझे
उसके साथ गुजारे लम्हे
स्कूल तक वो साथ जाना
मध्याह्ण के वक्त खाने की छिना झपटी
अचानक एक दिन गुलाब देकर
मुझसे से अपने प्यार का
इजहार किया था उसने
वो प्यार मेरे अंदर ज़िन्दा थी पल रही थी
तब तक जब तक मैं नहीं गया था शहर
अपनी ख़्वाहिशों को पूरा करने के लिए
शहर जाते समय छोड़ आया था
अकेला उसे गाँव में
वापस आया तो वह नहीं थी वहाँ
जहाँ छोड़ा था उसे
वह पास न होकर भी
मेरी तेज रफ्तार ज़िंदगी में
ज़िंदा थी कई बर्षों तक







आज फिर से गुलाब की
उन सूखी पत्तियों में
महसूस कर रहा था
उसकी खुशबू उसकी छुअन
वो दिन याद है मुझे
जब उसका दिया गुलाब हाथ में थामे
घर में तेज कदमों से आया था मैं
पापा ने यूँ हीं पूछा था मुझसे
मंदिर गये थे क्या ?
मेरा मासुम सा जबाब हाजिर था
हाँ, देवी पर चढाये फूल हैं
कितनी मासूमियत से
झुठ बोला था मैंने
पापा ने कहा था देवी पर चढ़े फूल हैं
तो अपनी किताबों में सहेज कर रख लो
मशवरा जानदार था









फूल को किताबों के पन्नों के मध्य रखकर
हर रोज उसे पढ़ने लगा था
किसी को शिकायत नहीं थी
कोई नहीं समझ पाया था
कि किताबों मे घंटों उसी पन्ने पर
मेरी निगाह क्यूँ टिकी होती थी
रोज पढ़ता था उसे और उसके चेहरे को
गुलाब की पत्तियाँ भले सुख गई थीं
पर उसके प्यार की खुशबू ने
मेरे अंर्तमन में गुलाबी खुशबू भर दी थी
कई सालों के बाद आज फिर
उसकी वही गुलाबी खुशबू
महसूस कर रहा था
सोच लिया था मैंने
उसके इस गुलाबी एहसास को
अपने अंर्तमन से कभी नहीं खोने दूँगा
जो मेरे अंदर जगा गई थी वो ।

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