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शनिवार, 26 अक्तूबर 2013

भारत, पश्चिमी देशों और इस्लामिक देशों में महिलाऐं

गंगेश ठाकुर

समाज की आधी आबादी के तौर पर अपनी सहभागिता निभानेवाली महिलाओं को हमेशा उनके अधिकारों और उचित स्थान के बारे में बातें तो की जाती हैं लेकिन फिर भी इस समय इस सभ्य समाज में महिलाओं को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। वर्तमान समय में लगभग सभी पश्चिमी देश महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा के बहाने संसार के सभी राष्ट्रों विशेषकर इस्लामी देशों पर महिलाओं के अधिकारों के हनन के मामले को लेकर आए दिन आरोप लगाते रहते हैं। एक शताब्दी से भी कम समय से पहले तक पश्चिम में महिलाएं अपने कई सारे व्यक्तिगत और समाजिक अधिकारों से वंचित थीं। यहां तक कि महिला अपनी कमाई से अर्जित धन, संपत्ति की भी मालकिन नहीं होती थीं। कई पश्चिमी देशों में महिलाएं मतदान जैसे अधिकार से भी अलग रखी गई थीं। पश्चिम के देशों में 19वीं शताब्दी के अंत में महिलाओं द्वारा अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिए विभिन्न प्रदर्शन किये गए जिनसे महिलाओं के अधिकारों और उनकी स्वतंत्रता का रास्ता साफ हो पाया।
इस्लामी देशों में कमोवेश हर जगह महिलाओं को हमेशा उनके अधिकारों से वंचित रखने की परंपरा सी ही चली आ रही थी जो आज भी लगभग जस की तस बनी हुई है। इस्लामी क्रांति के एक वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई ने महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा था कि, पश्चिम में महिला, एक इंसान होने से अधिक एक महिला है। पश्चिम के देशों ने महिला के अधिकारों के समर्थन के दावों के बावजूद उसे पुरूषों के हाथों की कठपुतली बना कर रख दिया, इनमें से सभी देशों ने केवल महिलाओं के यौन आकर्षण को ही उजागर किया। पश्चिमी संस्कृति तब भी महिला के नाम पर पुरूषों के हितों के लिए कार्यरत थी और महिला की स्वतंत्रता के बहाने महिला की सुन्दरता को बड़ी ही सरलता से पुरूष के अधिकार में रख देती थी। विश्व के सबसे सभ्य समाज के रूप में इतरानेवाले पश्चिमी देशों के समाज ने महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा के बहाने महिलाओं के मानवीय सम्मान को उससे छीन लिया और उसे कृत्रिम पुरूष बना दिया है। कहने के लिए तो इन देशों का और विश्व का महिलाकरण हो गया है किंतु अभी भी संसार पुरूष प्रधान है।
पश्चिमी समाज में आज भी महिलाओं के विरुद्ध हिंसा बढ़ ही रही है। सर्वेक्षणों की मानें तो पता चलता है कि पश्चिम में आर्थिक विकास और प्रगति के साथ-साथ लैंगिक दृष्टि से महिलाओं को इनके समाज ने अनदेखा किया है। पश्चिमी देशों की विचारक महिलाओं की माने तो विभिन्न मिश्रित कार्यस्थलों में महिलाओं पर यौन उत्पीड़न तेज़ी से बढ़ता जा रहा है। यहां महिलाओं द्वारा दूसरी महिला की जान की सुरक्षा करने के बजाए स्वयं अपनी सुरक्षा की आवश्यकता जान पड़ती है। हालांकि इस समय पश्चिमी देशों के औद्योगिक समाज ने, महिलाओं और पुरूषों के बीच के प्राकृतिक और आंतरिक अंतरों को अनदेखा करते हुए, किसी भी कार्य को करने हेतु उनके लिए समान अवसर उपलब्ध कराए हैं। लेकिन फिर भी मुख्य बात यह है कि पुरूषों के बराबर कार्य करने के बावजूद महिलाओं को कम वेतन मिलता है। अमरीका जैसे देश में बड़ी संख्या में महिलाएं वेतन के लिए कार्य करती हैं किंतु उन्हें भेदभाव का सामना करना पड़ता है।
पश्चिमी देशों में महिला उत्पीड़न का एक अन्य कारण परिवार में महिलाओं की भूमिका का कम होना या फिर समाप्त हो जाना है। पश्चिमी देशों की महिलाएं अब मातृत्व सुख, जीवनसाथी का सुख तथा परिवार के साथ रहने की भूमिका का उचित लाभ नहीं ले पाती हैं। पश्चिमी देशों की तुलना में इस्लाम धर्म में, महिला के संबंध में अलग किंतु वास्तविकता पर आधारित सोच है। इस्लाम में महिलाओं की समस्त विशेषताओं को सुरक्षित रखा गया है। धर्म के अनुसार कहीं भी यह वर्णित नहीं किया गया है कि महिला पुरूष जैसा सोचे या पुरूषों की तरह व्यवहार करे अर्थात महिला होने की विशेषता जो महिलाओं की प्राकृतिक व स्वभाविक विशेषता है उसे इस्लाम में सुरक्षित रखा गया है।
इस्लामी विचारधारा में पुरूषों और महिलाओं के बीच लैंगिक दृष्टि से न्याय का ध्यान रखा गया है। न्याय का यहां सीधा सा अर्थ मनुष्य की क्षमताओं और योग्यताओं के आधार पर अवसर उपलब्ध कराना है। इस आधार पर पुरूषों और महिलाओं को वे काम हीं सौंपने की बात कही गई है जो उनके स्वभाव एवं योग्यताओं के साथ क्षमताओं के अनुकूल हों। इसी को ध्यान में रखते हुए वर्तमान समय में इस्लामी गणतंत्र ईरान में महिलाएं,वहां विभिन्न पदों पर कार्यरत हैं।
लेकिन इससे अलग कई इस्लामिक देशों में महिलाओं की बात की जाए तो उन्हें किसी भी विषय पर क्या सही है अथवा क्या गलत इसके लिए नैतिकता या अपनी बुद्धि का प्रयोग करने की अनुमति नहीं है। इस्लाम में धर्म ग्रंथों कुरान व हदीस में लिखी हुई चीजें हीं नैतिकता का सबसे बड़ा प्रमाण है। धर्म के ठेकेदारों की माने तो कुरान व हदीस में लिखी हर बात सत्य है। हिन्दुओं के ग्रंथों में भी स्त्री के लिए यही सब कुछ लिखा हो सकता है पर बात यह है कि क्या हम अपने धर्म ग्रंथों पर आंख बंद कर विश्वास करते रहेंगे। भारत जैसे देश में स्त्री की दशा को उन्नत करने के लिए कई कानून संसद द्वारा बनाए जा चुके हैं जो किसी धर्मग्रंथ को आधार बनाकर नहीं तैयार किए गए बल्कि समाज में स्त्री की स्थिति का मूल्यांकन कर इसे तैयार किया गया है। परन्तु इस्लाम में स्त्री धर्म सुधार की कोई गुंजाइश नहीं रखी गई है यह केवल जडवादी मानसिकता के लोगों की सोच है जबकि ऐसा नहीं है। इनमें जिस सुधार की गुंजाईश भी है उसे भी कठमुल्लों की फौज ने और पेचीदा बना दिया है। ये ही वो कठमुल्ले लोग हैं जो कहते हैं कि कुरान व हदीस में किसी भी संशोधन की कोई जरूरत नहीं है। अच्छी चीजों के लिए तो सचमुच इसमें संशोधन की कोई जरूरत नहीं है।
इन कठमुल्लों की माने तो इस्लाम में स्त्री के अधिकार उसके भरण पोषण और पुरुषों की सेवा तक ही सीमित हैं बशर्ते कि वह अपने पुरुष की आज्ञाओं का पालन करे। इस्लाम का सामान्य विश्वास है कि पुरुष स्त्री की अपेक्षा श्रेष्ठ होता है । इस्लाम में कट्टरवादी सोच का एक प्रमाण यह भी है कि स्त्रियों पर पर्दे का कानून लागू किया गया है। इस धर्म ने केवल पुरूष को तलाक का अधिकार दिया है। महिला को इस विषय में कोई अधिकार नहीं है । इस्लाम में महिला को केवल भरण पोषण का अधिकार दिया गया है।
इस्लाम धर्म में महिलाओं को लेकर कभी भी कोई गलत स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है लेकिन कठमुल्लों ने महिलाओं के अधिकारों को अपने फायदे के लिए धर्म के नाम पर तोड़ मरोड़ कर पेश किया है। जो धर्म किसी महिला के वजन उठाने पर एतराज करता है वह उस पर जुल्म की इजाजत कैसे दे सकता है। जो लोग भी महिलाओं पर जुल्म करते हैं, उनका वास्ता उस धर्म से नहीं हो सकता, हालांकि वे अपने कारनामों को इस्लाम का हिस्सा बताकर इस धर्म को बदनाम करते हैं। इस धर्म को समझने के लिए सबसे पहले इसके संस्कृति विशेष और समाज विशेष की संरचना से अलग करके देखना होगा। अफगानिस्तान में अगर कुछ लोग अपनी शैली में जीवनयापन करते हैं तो इसकी वजह सामाजिक व्यवस्था, अफगानिस्तान की संस्कृति है न कि इस्लाम की। अगर औरतों पर जुल्म अफगानिस्तान में होता है तो वहां की संस्कृति इसके लिए जिम्मेदार है न कि इस्लाम धर्म,  इस्लाम में तो हमेशा इसे रोकने पर जोर दिया गया है। कुरान की ज्यादातर आयतें महिला और पुरुष दोनों को संबोधित करते हुए हैं, कुरआन का दृष्टिकोण दोनों के लिए समान है, यह महिला और पुरुष में भेदभाव नहीं करता। कुरआन में कहा गया है कि- हमने महिला और पुरुष दोनों को एक समान आत्मा दी है, दोनों की महत्ता एक समान है। इस्लाम में तलाक की इजाजत भी तब है जबकि जीवनसाथी का तरीका धर्म के अनुसार न हो, वह आपके साथ एब्यूसिव हो, निर्दयी हो, जालिम हो और कुछ अन्य। तलाक का मसला बहुत संवेदनशील है, सामान्य जीवन में उसका ख्याल आना भी गुनाह माना गया है। ऐसे में धर्म के ठेकेदारों ने इस्लामिक देशों में जो महिलाओं के अधिकार तैयार किए है वह उनके अपने फायदे को ध्यान में रखकर, ना की धर्मग्रंथों को। वो महिलाओं को समान अधिकार नहीं देना चाहते तो यह उनके स्वफायदे की बात है, न कि समाज और धर्म के फायदे की पश्चिमी देशों के साथ भी कुछ ऐसी ही बात लागू होती है वहां भी सरकारी एजेंसियों द्वारा संचालित महिला अधिकार की बातें धर्मग्रंथों से निर्धारित नहीं की जाती बल्कि अपने फायदे के लिए तैयार की गई हैं। भारत में भी कमोवेश महिलाओं की बदतर स्थिति के लिए धर्मग्रंथ नहीं बल्कि कानून या सिस्टम की पेचीदगी जिम्मेवार है।

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