Daily Calendar

सोमवार, 3 जनवरी 2011

बोफोर्स रक्षा सौदे में आईटीएटी के खुलासे










बोफोर्स रक्षा सौदे में अपने अहम फैसले में इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल(आईटीएटी) ने कमीशन बाजी के खेल की बात मानी है।आईटीएटी ने माना कि बोफोर्स रक्षा सौदे में चौसठ करोड़ की रकम को बोफोर्स कम्पनी द्वारा विन चड्डा और क्वात्रोची के स्विस बैंक के अकाउंट में भुगतान किया गया था।
इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल(आईटीएटी) द्वारा कमीशन बाजी के खेल के खुलासे ने वर्त्तमान केन्द्र सरकार के लिए और भी मुसिबत पैदा कर दी है। पहले से हीं कई घोटालों के भंवर जाल में उलझी केन्द्र सरकार विपक्षियों के निशाने पर थी हीं रक्षा सौदे पर आईटीएटी के इस खुलासे ने सरकार की मुश्किलें और बढ़ा दी है।
गौरतलब है कि मार्च 1986 में केन्द्र में राजीव गॉधी की अगुआई में कांग्रेस पार्टी की सरकार ने अमेरिका से 410 बोफोर्स तोपों का सौदा 1437 करोड़ रुपये के लगभग में किया था। इस रक्षा सौदे में विन चड्डा और क्वात्रोची के स्विस बैंक अकाउंट में इन दोनों द्वारा बोफोर्स कंपनी के लिए किये गये दलाली के बदले चौसठ करोड़ की रकम कमीशन के रूप में दी गई। क्वात्रोची इटली का रहने वाला था और उसके संबंध इस कारण उस समय के तात्कालिन प्रधानमंत्री राजीव गॉधी और उनकी पत्नी सोनिया गॉधी के साथ काफी अच्छे थे। क्वात्रोची से कांग्रेस के अच्छे संबंधों के कारण कांग्रेस उसे बचाने की हमेशा कोशिश में लगी हुई थी।
बोफोर्स रक्षा सौदे में तब की तात्कालिन सरकार ने यह नियम बनाया था कि इस रक्षा सौदे में सारी कार्यवाही सरकार और बोफोर्स कंपनी के बीच सीधे तौर पर की जायेगी। नियम में यह भी जिक्र था कि इस रक्षा सौदे में दोनों तरफ से कोई भी बिचौलिया नहीं होगा और अगर कंपनी ने इस सौदे में किसी को भी कमीशन दी तो कुल रक्षा सौदे की राशि से कमीशन की राशि काट कर कंपनी को भुगतान किया जायेगा। लेकिन सरकार के इन नियमों की धज्जियॉ तब उड़ी जब बोफोर्स रक्षा सौदे में खरीदे गये तोपों की कुल कीमत का तीन प्रतिशत हिस्सा कमीशन के रूप में विन चड्डा और क्वात्रोची के स्विस बैंक अकाउंट में ट्रांसफर कर दिया गया, इतना होने पर भी सरकार ने नियमों की अनदेखी की और कमीशन के पैसों का भी भुगतान बोफोर्स कंपनी को कर दी गई।
बाद में कमीशन के ये पैसे तब के कुछ राजनेताओं, सैन्य अफसरों और नौकरशाहों के बीच बॉट ली गई।
बात यहीं खत्म नहीं होती है बल्कि बड़ा सबाल यह है कि देश की सुरक्षा के लिए खरीदे गये रक्षा उपकरणों के लिए दी गई दलाली पर भी तब की तात्कालिन सरकार चुप क्यूँ थी ? सरकार ने बोफोर्स कंपनी से जो तोपें खरीदीं उनकी गुणवत्ता वैसी नहीं थी जैसा कंपनी ने सौदे से पहले बताया था। सरकार बोफोर्स तोप सौदे में जानबुझकर भी दलाली के पैसे का भुगतान रक्षा सौदा कानून के विरूद्ध जाकर क्यों करती रही ?
ऐसे में तात्कालिन सरकार, नौकरशाहों, और सैन्य ऑफिसरों की मंशा स्पष्ट हो गयी थी की रक्षा सौदों की कमीशनबाजी के पैसे से देश को भले चौसठ करोड़ का चूना लग जाये लेकिन देश की इस सबसे संवेदनशील सौदे के जरिए अपने बारे न्यारे करने में कोई बुराई नहीं है। इस रक्षा सौदे के जरिए खरीदे गये तोपों की असलियत भी कारगिल के युद्ध में सामने आ गई जब इन तोपों की गुणवत्ता पर सेना के जवानों ने सवाल खड़े कर दिये। रक्षा सौदों में हुए इस घोटाले से यह स्पष्ट हो गया कि इन राजनेताओं, नौकरशाहों, और सैन्य ऑफिसरों को देश की सुरक्षा की थोड़ी भी चिंता नहीं थी। ऐसे में देश की सुरक्षा व्यवस्था बनाये रखने वाली एजेंसियों पर से लोगों का विश्वास डिगने लगा है।
...............................................................GANGESH KUMAR THAKUR

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें