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शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

मेरी चाहत.............







अच्छा हुआ कि तुमने आँखों से गिला किया
और मैं मजबूर तुमसे सज़दे में मिला किया
तुम चाहती थी लंबी हो मेरी उमर यूँ
तुम चाहो मुझे और मैं तुमसे नमाज़ों में मिला किया
सफेद चादर में लिपट कर चला गया मैं दुनियाँ से
तुम रोती रही और मैं जन्नत में तुम्हें ढ़ूँढ़ता फिरा
मेरी आहटों पर तुम यूँ दौड़ कर आती रही
मैं कब्र में पड़े-पड़े तुम्हें बुलाता रहा
खुशनसीबी मेरी थी कि तुम मेरी चाहत थी
तुम चाहती रही और मैं तुमसे पीछा छुड़ाता रहा
जिंदगी भी वेवक्त रूसवा हो गयी मुझसे
मैं तुझमें खोना चाहता था और तुम्हारा साया भी पीछा छुड़ाता गया
तेरी चाहत जब तक मेरे दिल को समझ में आयी
तुम्हें पाने की चाहत में मैं अपना सब कुछ लुटाता गया............


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