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सोमवार, 18 जुलाई 2011

संसद में मानसून




मानसून........
स्वागत है तुम्हारा
मेरे देश में
तेरे आने से
मौसम की तपन
कुछ कम हुई है
देश की सड़कों पर
गलियों में
मुहल्लों में
शहरों में और गाँवों में
अगर तुम
देश की संसद में भी
पधारोगे तो
शायद, संसद के अंदर
की तपन भी
कुछ कम
हो सकती है
तुम्हारे आने से
सावन की रिमझिम
वारिश का मंज़र
कितना सुहावना लगता है












कितना अच्छा हो
यदि तुम यही रिमझिम लेकर
हमारी संसद में आ जाओ
फिर संसद के अंदर भी
मौसम सुहाना
हो सकता है
संसद से अन्ना के
आंदोलन का कुछ अर्थ
निकल सकता है
संसद के अंदर
कुछ ठंढ़क
फैल सकती है
संसद में
ठंढ़े विचारों के
मध्य से
जन लोकपाल बिल पर
तुम्हारे हीं नाम से
चलने वाले
संसद के सत्र में
कुछ निर्णय
हो सकता है
शायद, संसद से बाहर
तुम्हारे साथ-साथ
भ्रष्टाचार से
जनता को
मुक्ति दिलाने वाली
जन लोकपाल बिल
को संसद से
बाहर आने का
रास्ता मिल जाने की़
कल्पना की जा सकती है












शायद, संसद में तुम्हारे होने से
अन्ना का आंदोलन
निरर्थक नहीं होगा
इस पर विश्वास
किया जा सकता है
संसद की गरिमा
वहाँ तुम्हारे होने से
बच जाएगी
ऐसा, माना जा सकता है
तुम्हारे संसद में
प्रवेश करने से
जन लोकपाल
और ताकतवर होगा
ऐसा कहना ध्रुव सत्य
हो सकता है
ऐसे में
तुम्हारे हीं नाम से
चलने वाले
संसद के इस सत्र में
जन लोकपाल बिल
बिना किसी फेरबदल के
तुम्हारे साथ
संसद से सड़क तक की
दूरी तय करके
देश की जनता के
मध्य तक पहूँच पाऐगा
ऐसा सोचना
बिल्कुल उचित होगा
इसलिए हे मानसून
स्वागत है तेरा
और तेरे नाम से
चलनेवाले सत्र का
इस देश में......


---------------------------------------------(गंगेश कुमार ठाकुर)


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