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सोमवार, 18 जुलाई 2011

आतंकवाद के मुद्दे पर ये नाटक क्यूँ ?







मुंबई शहर हादसों का शहर है............. हिन्दी फिल्म का ये गाना तब भी ये सोचकर नहीं लिखा गया होगा लेकिन बीते कुछ सालों की बात की जाए तो ऐसा लगने लगा है कि मुंबई शहर सचमुच हादसों का शहर बन गया है । इक्कतीस महीने पहले हुए आतंकवादी हमले के दहशत से अभी पूरी तरह शहर की जनता बाहर भी नहीं निकल पाई थी, आम जिंदगी उन खौफ़नाक यादों के मंजर से बाहर निकलने की कोशिश हीं कर रही थी कि अचानक मुंबई के अतिव्यस्त माने जाने वाले ओपेरा हाउस, झवेरी बाजार, और दादर में फिर से क्रमवार तीन बम विस्फोट ने पूरी हिन्दुस्तानी आवाम के आँखों की नींद गायब कर दी । इस हमले में 18 लोगों की मौत हो गयी और सैकड़ों लोग घायल हो गये, इन मासुम लोगों की मौत के इस खेल में किसी ने अपना भाई खोया तो किसी ने अपना बेटा किसी ने अपने पति को खोया तो किसी बच्चे के सर से बाप का साया उठ गया । लेकिन घटना के ठीक बाद से हीं इस पर सियासी गीत गाये जाने लगे, आरोप-प्रत्यारोप और घटना पर सफाई देने का काम तेजी से चलने लगा । सुरक्षा एजेंसी हो या जांच एजेंसी या फिर सरकार सब का रवैया एक सा था हर कोई बस इस घटना पर या तो सफाई देने के मकसद से मीडिया के सामने हाजिर हो रहे थे या इस घटना पर अफसोस जताने के लिए। इतना वक्त गुज़र जाने के बाद भी आज तक इस घटना से जुड़े लोगों को पकड़ पाने में या उसका पता लगा पाने में सुरक्षा एजेंसियां पूरी तरह से नाकाम रही हैं । ऐसा नहीं है कि देश में ऐसी घटनाऐं पहले नहीं हुई, समय-समय पर दिल्ली, अजमेर, अहमदाबाद, बैंगलुरु जैसे कई शहर इन आतंकी हमलों का दंश झेलते आ रहे हैं, लेकिन इतना कुछ होने के बाद भी सुरक्षा एजेंसियों की लचर व्यवस्था से देश को इस तरह के आतंकी हमलों से दो-चार होना पड़ रहा है । इस तरह की आतंकी गतिविधियों में नुकसान सीधा-सीधा देश की भोली-भाली जनता का होता है ।
ऐसे हमले के बाद सुरक्षा एजेंसियां, जांच एजेंसियां और सरकार या तो एक दूसरे पर दोषारोपण कर रही होती हैं या एक दूसरे के बचाव में खड़ी हो जाती है । ऐसे में देश की सुरक्षा व्यवस्था भगवान भरोसे है यह कहना गलत नहीं है । भारत की आर्थिक राजधानी कहे जाने वाले इस शहर को अगर इस तरह की दहशतगर्द ताकतों का बार-बार निशाना बनना पड़ रहा है तो यह कोई अजीबो-गरीब बात नहीं है, क्योंकि दहशतगर्दी फैलाने वाले इन शैतानों को यह अच्छी तरह से पता है कि किसी भी देश में दहशत फैलाने के लिए पहले उस देश की अर्थव्यवस्था को कमजोर करने की जरूरत है । ऐसे में एक तरफ तो इन दहशतगर्द ताकतों की सह पर देश के अंदर जाली नोटों का कारोबार धड़ल्ले से चल रहा है, वहीं दूसरी तरफ समय-समय पर देश के बड़े शहरों में बम के धमाके और गोलीबारी जैसी घटनाओं को अंज़ाम दिया जा रहा है । भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई इन दहशतगर्द ताकतों की लिस्ट में नंबर वन पर आता है, ऐसे में मुंबई जैसे शहर की सुरक्षा बहुत अहम हो जाती है । लेकिन सुरक्षा की इस तरह की चुक इस बात की तरफ स्पष्ट इशारा करती है कि सुरक्षा एजेंसी हो या सरकार कोई भी अपने कर्तव्य का निर्वाह सही ढ़ंग से नहीं कर रही है । इतने सारे आतंकी हमलों के बाद भी न तो सुरक्षा एजेंसियां हीं सर्तक हो पायी हैं न हीं सरकार इन हमलों से देश को बचाने की कोई ठोस व्यवस्था कर पाई है ।












हां, लेकिन सरकार के अंदर बैठे कुछ नेता इतना कुछ हो जाने पर भी अपनी पीठ थपथपाते नजर आते हैं, मुंबई में आतंकी हमले के बाद कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह का बयान आया कि भारत आज भी पाकिस्तान से बेहतर स्थिति में है, क्योंकि पाकिस्तान में तो हर दिन हर सप्ताह इस तरह के बम धमाके होते रहते हैं । यह बयान दिग्विजय सिंह कांग्रेस के दूसरे महासचिव राहुल गांधी के बयान के बचाव में दे रहे थे । राहुल गांधी ने इस हमले के ठीक एक दिन बाद मीडिया के सामने यह बयान दिया था कि देश में होने वाले प्रत्येक आतंकी हमले को रोकना मुमकिन नहीं है । उन्होंने कहा कि इन हमलों को रोकने पर स्थानीय स्तर पर प्रयास करने की जरूरत है । राहुल ने ये भी कहा कि ऐसे 99 फीसदी हमले रोके जा चुके हैं । इन नेताओं को ये पता होना चाहिए की 9/11 के बाद अमेरिका में कोई आतंकी हमला नहीं हुआ ऐसे में भारत को इस तरह के हमलों से बचाने के प्रयास न करना और केवल इस पर सफाई देकर ये नेता क्या करना चाहते हैं समझना थोड़ा मुश्किल लगता है । पी चिदंबरम ने तो यहां तक कह दिया कि हमारा देश दुनिया के सबसे अशांत पड़ोसियों से घिरा हुआ है । इसलिए देश का हर शहर असुरक्षित है । जब गृहमंत्री के बयान इस किस्म के होंगे तो देश की सुरक्षा व्यवस्था कैसी होगी यह समझ पाना नामुमकिन नहीं है, उपर से कांग्रेस के एक नेता का बयान आता है कि 26/11 के 31 महीने के बाद देश में कोई आतंकी हमला हुआ है यह सरकार की बहुत बड़ी उपलब्धि है । सवाल यह है कि क्या 31 महीने का समय देश में आतंकी हमला न होने के लिए लंबा समय है या देश को कभी इन हमलों से पूरी तरह से निजात मिल पाएगा ?










इस बीच मुंबई हमले पर कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह के कई ऐसे बयान भी आ गये जिनसे यह स्पष्ट हो गया कि ये बयान मुंबई की जनता के लिए सांत्वना स्वरूप नहीं दिए गए बल्कि राजनीति से औत-प्रौत होकर दिए गए थे । अपने बयान में दिग्विजय सिंह ने कहा कि मुंबई धमाकों में हिंदू संगठनों की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पास बम बनाने के कारखाने हैं । ऐसा नहीं है कि इस तरह की बयानबाजी पहली बार हुई है इससे पहले राहुल गांधी ने भी कहा था कि देश को हिंदू आतंकवादियों से ज्यादा खतरा है । लेकिन पार्टी को ये समझने की जरूरत है कि आतंकवाद का कोई मजहब नहीं होता देश को सुरक्षा से मतलब है न कि आतंकवाद के जातिगत पहचान से, देश में शांति कायम करने की जरूरत है न कि मजहबी ताने देकर किसी खास मजहब के लोगों को वोट बैंक की राजनीति के लिए जनता की नजरों में गिराने की, इस तरह की बयानबाजी से कोई नतीजा नहीं निकलने वाला है । जरूरत है तो बस आतंकवाद के बढ़ रहे जहरीले फन को कुचलने की । मुंबई के लोगों को लाखों सलाम है जिन्होंने 31 महीने में हुए इस दूसरे आतंकी हमले के बाद भी साहस का परिचय दिया और आम जिंदगी इन हमलों के बाद भी बिना रूकावट के चल रही है, इन नेताओं से तो बेहतर आतंकवाद को करारा जबाब मुंबई की आवाम ने दिया है इसलिए सलाम मुंबई..................

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