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सोमवार, 8 अगस्त 2011

जनलोकपाल बिल – सरकार की मंशा क्या है ? (गंगेश कुमार ठाकुर)






जनलोकपाल बिल 42 वर्षों से पारित होने की ख्वाहिश लिए सरकार के सामने पड़ा हुआ है । इस लंबे समयांतराल में कितनी सरकारें बनी और उनका कार्यकाल समाप्त हो गया लेकिन जनलोकपाल बिल तब भी संसद के जिस कोने में पड़ा अपनी बारी का इंतजार कर रहा था आज भी वह वहीं यथावत पड़ा है। मजे कि बात यह है की अभी जनता के द्वारा जनलोकपाल बिल को पूरा समर्थन मिलने और इसकी पुरजोर मांगों के बीच संसद के इस मानसून सत्र में भी इसका पारित होना मुश्किल ही लगता है। इस बिल पर संसद में पार्टीयों के बीच आम सहमति नहीं बन पा रही है। वहीं दूसरी तरफ देश को भ्रष्टाचार मुक्त कराने का संकल्प लेकर आगे बढ़ रहे गांधीवादी नेता अन्ना हजारे इस बिल को संसद में पारित कराने के लिए पार्टीयों में आमसहमति बनाने के उद्देश्य से हरेक पार्टी के बड़े नेता से मिल रहे हैं । लेकिन वर्तमान केन्द्र सरकार इस बिल को मानसून सत्र में पारित करवाने में अपने आप को असमर्थ पा रही है । दूसरी तरफ अन्ना हजारे ने लोकपाल बिल को संसद के इस सत्र में न पारित होने पर 16 अगस्त से पुन: आमरण अनशन पर जाने की पूर्वनियोजित घोषणा से भी सरकार को अवगत करा दिया है।
गौरतलब है कि देश में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना की यह मुहिम 5 अप्रैल को जंतर-मंतर से शुरू हुई तो सरकार की आँखों से नींद गायब हो गयी। मुहिम की शुरूआत से हीं अन्ना को जनता का पूरा समर्थन मिलता रहा और अन्ना के पांच दिनों के अनशन में ही सरकार को अन्ना की बात माननी पड़ी, लेकिन सरकार का इस बिल को लेकर ढ़ुलमुल रवैया जल्द हीं स्पष्ट नजर आने लगा । 36 वर्ष पूर्व देश में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में सन 1975 में इन्हीं मुद्दों को लेकर विशाल जनआंदोलन किया गया था । इस जनआंदोलन की मांग सरकार से भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी और शैक्षिक स्तर में सुधार लाने की थी। जयप्रकाश नारायण के इस आंदोलन में देश की शक्ति कहे जाने वाले युवा वर्ग का पुरजोर समर्थन मिला था, आन्दोलन ने अपना असर दिखाया और तब इन्दिरा गांधी चुनाव हार गयी थी। लोकपाल बिल उससे कुछ साल पहले हीं संसद के समक्ष रखा जा चुका था, लेकिन तब की सरकार भी इसे पारित कराने में आनाकानी करती रही और आज भी सरकार इस बिल से बचकर निकलने की फिराक में है इसकी असली वजह क्या है इसे समझने की जरूरत है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह रही है कि लंबे समय तक कांग्रेस या कांग्रेस समर्थित पार्टीयों की सरकारें केन्द्र में रही हैं और कांग्रेस पार्टी के साथ यह बड़ी समस्या रही है कि वह न तो सत्ता में किसी की हिस्सेदारी पसंद करती है न ही सत्ता में किसी किस्म की दखल कांग्रेस को बर्दाश्त होती है । ऐसे में सरकार के समानान्तर एक दूसरी स्वायत्त व्यवस्था जिस पर सरकार का नियंत्रण नहीं होगा यह कांग्रेस कैसे बर्दाश्त कर पाएगी यह सोचने वाली बात है।
जयप्रकाश आंदोलन के ठीक 36 वर्ष बाद भारत के राजनीतिक पटल पर उतार-चढ़ाव के बीच अन्ना के जनआंदोलन की शुरूआत ठीक उन्हीं मुद्दों के साथ हुई जिसकी नींव पर एक बार जयप्रकाश ने महल खड़ा कर जनता को उनकी शक्ति का बोध करा दिया था। अन्ना को इस आंदोलन के लिए जनता को जागरूक करने के लिए कोई खास मशक्कत नहीं करनी पड़ी क्योंकि देश की जनता को अपनी शक्ति का अंदाजा जयप्रकाश आंदोलन के समय ही लग गया था । अन्ना ने केवल आवाज लगाई और जनता की भीड़ उमड़ पड़ी, जंतर-मंतर ठसाठस भर गया । सरकार को जयप्रकाश आंदोलन का हर दृश्य स्पष्ट दृष्टिगोचर होने लगा। सरकार अच्छी तरह जानती है कि कोई भी जन विरोध धीरे-धीरे बढ़कर जन विद्रोह का रूप ले लेती है, इसलिए सरकार ने अन्ना की बात मान लेना ही उचित समझा और आनन-फानन में जन लोकपाल पर विचार के लिए कमेटी का गठन कर ड़ाला, लेकिन इतने पर बात समाप्त नहीं हुई सरकार उल्टे दोहरी समस्या में फंस गयी एक तो अन्ना हजारे के समर्थन में देश की तमाम जनता खड़ी हो गई है जो सरकार की तरफ टकटकी लगाये देख रही है, वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस और उसके घटक दलों के साथ हीं साथ विपक्ष के बीच इस बिल को लेकर आम सहमति नहीं बन पा रही है।











जनलोकपाल बिल को लेकर जनता के बीच काफी उत्सुकता बनी हुई है, लेकिन देश की बड़ी आबादी आज भी नहीं समझ पाई है की आखिर यह जादुई छड़ी है क्य़ा ? सरकार क्यों लोकपाल पर अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं कर पा रही है ? क्यों पक्ष और विपक्ष के बीच इस बिल को लेकर आम सहमति नहीं बन पा रही है ? प्रधानमंत्री और न्यायपालिका को इसके दायरे से बाहर रखने की बात क्यों की जा रही है ? क्यों सरकार इसे संविधान के समानान्तर एक दूसरी व्यवस्था का नाम दे रही है ? क्यों सरकार सिविल सोसायटी के बनाये गये जनलोकपाल विधेयक को पारित कराने में अपने आप को असमर्थ पा रही है ?
इन सवालों के जबाब जनता को तभी समझ आयेंगे जब जनता जन लोकपाल बिल को ठीक तरह से समझ सकेगी।
 इस कानून के तहत केन्द्र में लोकपाल और राज्य में लोकायुक्त का गठन होगा।
 यह संस्था निर्वाचन आयोग और सुप्रीम कोर्ट की तरह सरकार से स्वतंत्र होगी । कोई भी नेता या सरकारी अधिकारी इसकी जांच प्रक्रिया को प्रभावित नहीं कर पाएगा।
 किसी भी मुकदमे की जांच एक साल में पूरी होगी । ट्रायल अगले एक साल में पूरा होगा ।
 भ्रष्टाचार की वजह से सरकार का जो भी नुकसान हुआ है अपराध साबित होने पर उसे अपराधी से वसूला जाएगा ।
 यदि किसी नागरिक का कोई काम तय समय सीमा में नहीं होता है तो लोकपाल दोषी अफसर पर जुर्माना लगाएगा और वह जुर्माना शिकायतकर्ता को मुआवजे के तौर पर मिलेगा।
 लोकपाल के सदस्यों का चयन जज, नागरिक और संवैधानिक संस्थाऐं मिलकर पारदर्शी तरीके से करेंगी । इसमें नेताओं का कोई हस्तक्षेप नहीं होगा ।
 लोकपाल/लोकायुक्तों का कामकाज पूरी तरह से पारदर्शी होगा । लोकपाल के किसी भी कर्मचारी के खिलाफ शिकायत आने पर उसकी जांच दो महीने में पूरी कर उसे बर्खास्त कर दिया जाएगा।
 सीवीसी, विजलेंस विभाग और सीबीआई के ऐंटीकरप्शन विभाग का लोकपाल में विलय हो जाएगा ।
 लोकपाल को किसी जज, नेता या अफसर के खिलाफ जांच करने और मुकदमा चलाने की पूरी शक्ति और व्यवस्था होगी।
जनलोकपाल बिल के कुछ मुद्दे सरकार और लोकपाल सिविल सोसायटी के बीच विवाद का कारण बन गयी है। सरकार और सिविल सोसायटी के बीच जो मुद्दे विवाद का कारण बने हैं उनमें से पांच मुद्दे को सरकार मानने को तैयार नहीं है।
 उच्च न्यायपालिका के जजों और प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाना ।
 लोकपाल को किसी भी भ्रष्टाचार पर स्वत: संज्ञान लेने का अधिकार होगा।
 लोकपाल के सदस्यों का चयन जज, नागरिक और संवैधानिक संस्थाऐं मिलकर पारदर्शी तरीके से करेंगी । राजनेताओं का इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं होगा ।
 लोकपाल के पास अपनी शक्ति होगी ताकि वह खुद जांच शुरू कर सकेगा । सीबीआई के ऐंटीकरप्शन विभाग का लोकपाल में विलय हो जाएगा ।
 भ्रष्ट अधिकारी या नेता पर मुकदमा चलाने के लिए लोकपाल को किसी पूर्व अनुमति की जरूरत नहीं होगी ।
सरकार द्वारा लोकपाल सिविल सोसायटी के इन पांच मुद्दों को ना मानने की वजह भी है जो जनता अच्छी तरह से समझ सकती है । भ्रष्टाचार राजनेताओं और अफसरों की मिली भगत का ही नतीजा है । अगर राजनेता और नौकरशाहों को लोकपाल के दायरे से अलग रखा गया तो इस व्यवस्था की भी कोई अहमियत नहीं रह जाऐगी और भ्रष्टाचार निर्विरोध जारी रहेगा । अगर लोकपाल को किसी अनुमति के बगैर जांच का अधिकार नहीं दिया गया तो यह सीवीसी की तरह ही अप्रभावी व्यवस्था होगी । अगर लोकपाल के चयन और नियुक्ति का अधिकार सत्ता पक्ष और विपक्ष के सदस्यों से बनी कमेटी द्वारा की जाएगी तो लोकपाल की स्वायत्तता और निष्पक्षता दोनों सवालों के घेरे में कैद होकर रह जाएगी, क्योंकि कोई भी पार्टी सशक्त और स्वतंत्र लोकपाल नहीं चाहेगी ।










इन पांच अहम मुद्दों को अगर सरकार नहीं मानती है तो लोकपाल का कुछ मायने नहीं बच जाता है फिर तो लोकपाल सीबीआई और सीवीसी की तरह की संस्था हो जाएगी जैसे सीबीआई के पास शक्ति तो है लेकिन वह स्वतंत्र नहीं है और सीवीसी के पास स्वतंत्रता तो है लेकिन उसके पास शक्ति नहीं है ।
अहम बात तो यह है कि सरकार के पास लोकपाल सिविल सोसायटी की बात न मानने के ढ़ेरों तर्क है सरकार तो प्रेस और मीड़िया के सामने यह कहती रहती है कि संविधान के समानान्तर एक और दूसरी व्यवस्था खड़ी करने से संविधान की गरिमा कम हो जाएगी । वहीं दूसरी तरफ सरकार को प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने पर उनकी प्रधानमंत्री पद की गरिमा कम होती नजर आती है जबकि प्रधानमंत्री खुद लोकपाल के दायरे में आने की अपनी मंशा जाहिर कर चुके हैं, लेकिन कांग्रेस पार्टी के नेताओं का कहना है कि यह उनकी अपनी राय है पार्टी उनसे अलग राय रखती है । सरकार द्वारा गठित लोकपाल कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि अगर प्रधानमंत्री की जांच संसद के बाहर की कोई संस्था करती है तो सरकार की साख कमजोर होगी और इससे संसद की संप्रभुता खतरे में पड़ेगी । अगर प्रधानमंत्री ने गलती की है तो जांच का अधिकार संसद के पास ही रहे । 2001 में प्रणव मुखर्जी की अगुवाई में लोकपाल की स्टैंडिंग कमेटी की रिपोर्ट पर गौर करें तो पता चलेगा जहां यह लिखा गया है कि उच्च न्यायपालिका के जजों और चुनाव आयोग को तो लोकपाल के दायरे से बाहर रखना चाहिए, लेकिन प्रधानमंत्री की जांच का अधिकार लोकपाल को होना चाहिए क्योंकि प्रधानमंत्री दूसरे मंत्रियों की तरह सरकारी नौकर हैं । खैर, विगत दस वर्षों में प्रधानमंत्री पद की गरिमा इतनी कैसे बढ़ गयी यह मामला विचार के लायक है , रही बात संसद के गरिमा की तो इन जनता के सेवकों को तब संसद की गरिमा का ख्याल नहीं रहता जब सदन में गाली-गलौज से लेकर हाथापाई तक की नौबत आ जाती है, जब शोर-शराबे के बीच सदन की कार्यवाही नहीं चलने दी जाती है, जब सरकार बचाने के लिए नोटों के बल पर सांसदों की खरीद-फरोख्त की जाती है और संसद के बीच हरे-हरे नोट लहराऐ जाते हैं, जब ए. राजा, कलमाड़ी, मारन जैसे लोगों की करतूतों पर सरकार अपने बचाव में लीपापोती का काम कर रही होती है ऐसे कई और सवाल हैं जिनसे संसद की गरिमा भंग होती है लेकिन संसदीय गरिमा क्या चीज है इसको बेहतर तरीके से वही लोग समझा पाऐंगे जो संसद के भीतर और बाहर यह चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे हैं कि अगर जनलोकपाल बिल के मसौदे में फेर बदल नहीं किया गया तो संसद की गरिमा खतरे में पड़ जाएगी । अब यह देखना ज्यादा जरूरी हो गया है कि 16 अगस्त तक सरकार जनलोकपाल बिल को लेकर किसी मुद्दे पर पहुंच पाती है या अन्ना को फिर से अनशन पर जाने की जरूरत पड़ेगी ? हल कुछ भी निकले जनलोकपाल बिल अभी भविष्य के गर्भ में सोया हुआ है लेकिन अन्ना और अन्ना जैसे देश के तमाम जनलोकपाल बिल के पक्षधरों के लिए पुरानी हिन्दी फिल्म का एक गाना बड़ा सटीक बैठता है- बहुत कठिन है डगर पनघट की..........................


गंगेश कुमार ठाकुर

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