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शुक्रवार, 19 अगस्त 2011

आवाज़ देना चाहता था तुम्हें


ये प्यार की एक ऐसी दास्तान है जो अभी तक पन्नों पर कलम के सहारे नहीं लिखी गयी थी शायद इससे सामना करने की क्षमता नहीं थी लेकिन आज बड़ी ताकत लगाकर आप लोगों के लिए ये मेरी कलम ने लिख तो दिया पर पता नहीं इस पर आपकी प्रतिक्रिया कैसी रहेगी ये जानने की जरूरत है मुझे ...............धन्यवाद........।।










आवाज़ देना चाहता था तुम्हें
पर ये जानता हूं मैं
तुम्हें कोई आवाज़ दे
हरगिज़ बर्दाश्त नहीं है तुम्हें
यही सोचकर चुप रह जाता हूं
दिनभर टकटकी लगाये
अपनी खिड़की के ठीक उस पार
तुम्हारी बालकनी में देखता हूं
यह सोचकर की शायद
तुम्हारा दीदार हो जायेगा
लेकिन पिछले कुछ दिनों से
तुम्हारी बालकनी में
धूल की परतें बिछ गयी है
अब समझ गया हूं
तुम यहां नहीं हो आजकल
फिर भी अपनी खिड़की की आड से
झांक लिया करता हूं
तुम्हारी बालकनी में
तुम्हारे पड़ोसी ने
अपने कमरे में
जो ताला लगा रखा है
उस ताले पर
तुम्हारा नाम लिखा है
अब तेरी याद को
अपने अंदर
ज़िंदा रखने का
एक नया अंदाज
मिल गया है













मैं भी खरीद लाया हूं
एक ताला
उसी कम्पनी का
जिस पर
तुम्हारा नाम लिखा है
अब खिड़की की आड से
तुम्हारी बालकनी में
देखना छोड़ दिया है
पर कई दिनों बाद
अनायास हीं आज फिर
तुम्हारी बालकनी में
झाँक लिया है
बालकनी में
कुछ हलचल सी
दिख रही है
अचानक तुम बालकनी में
दिख गयी मुझे
तुम्हारे माथे पर
सिंदूर की लाली है
मैं समझ गया
तुम किसी और की
हो गई हो
लेकिन मेरे दिल के अंदर
जो तुम्हारे होने का ख्याल है
उसे कैसे मिटा सकती हो
और हां
वो तुम्हारे नाम वाला ताला
आज भी मेरे पास है
जो मुझे
एहसास दिलाता रहता है
तुम यहीं हो
मेरे पास यहीं कहीं हो...............


......................................(गंगेश कुमार ठाकुर)

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