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गुरुवार, 20 अक्तूबर 2011

मेरी हथेली पर

उसने मेरी हथेली पर
अपनी अंगुलियों से
कुछ लिखा था
संवेदनाओं का तीर था
और कुछ भी नहीं था
वो आँखों में आँखें ड़ाले
मुझे इशारे से
कुछ कहना चाहती थी
वो मासूम चाहत थी उसकी
और कुछ भी नहीं था





मैं ख़्वाबों से उसे जगाने की
कोशिश मे लगा था
वो ख़्वाबों को ज़िंदगी बनाने की
ज़िद्द कर रही थी
मैं उसे ज़िंदगी की तन्हाई के
भंवर से निकालना चाहता था






वह इश्क के भंवर में
उलझती चली जा रही थी
वहाँ सूनापन था
जहाँ वो थी मैं था
मगर शिकायत शोर की
वह निरंतर कर रही थी






वो मिलने को मिलना
नहीं कह रही थी
मगर बिछुड़ने को बेवफाई
वह कहे जा रही थी
वो सागर को दरिया
वो दरिया को सागर कह
ज़िंदगी को खुद हीं
ड़ुबोये जा रही थी

3 टिप्‍पणियां:

  1. वो मिलने को मिलना
    नहीं कह रही थी
    मगर बिछुड़ने को बेवफाई
    वह कहे जा रही थी
    sahi hai.ladkiyan kuch asi hi hoti hai...bhavuk,
    bahut acchi panktiyan.
    mere blog par swagat hai

    उत्तर देंहटाएं
  2. ऐसी उलझन बस उलझकर ही सुलझाई जा सकती है ,बहुत अच्छी लगी जनाब आपकी ये कविता..........छू गयी किसी कोने को......

    उत्तर देंहटाएं
  3. ऐसी उलझन बस उलझकर ही सुलझाई जा सकती है ,बहुत अच्छी लगी जनाब आपकी ये कविता..........छू गयी किसी कोने को......

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