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मंगलवार, 8 नवंबर 2011

धरती के गर्भ में


हो गई है धरती
अब एकदम बांझ
मानो कोख उजड़ गई हो
किसी माँ की
और नहीं बन पाऐगी
वह माँ कभी
ऐसा महसूस
करने लगी है वह
नहीं फूटकर निकलता हैं
पौधा धरती के गर्भ से
चाहे उसके गर्भ में
कितनी हीं गहराई में
डाल दिया जाए दाना
उजड़ गये हैं खलिहान
सूख गई है क्यारियाँ
फट गई है ज़मीन बीचोंबीच
मानो सीता
समाना चाहती हो इसमें











उसी जमीन पर माथा टेके
पड़ा है एक बच्चा
झाँकना चाहता है
धरती के गर्भ में
देखना चाहता है
क्यूँ नहीं निकल रहा है
पौधा धरती के गर्भ से बाहर
पीछे बैठा गिद्ध
निहार रहा है
अपनी भूखी नज़र से
उस हाड़-माँस के लोथडे को
लेकिन वह पास नहीं जा रहा
लगता है उसे
ज़िंदा है वह शरीर









प्रकृति के नियमों से खेलना
बच्चा हो या बड़ा
सभी को भारी पड़ता है
धरती के गर्भ में
झाँकने की कोशिश ने
छीन ली है उसकी ज़िंदगी
आज धरती के साथ
एक और कोख
उजड़ गई है
ड़ाल गई है वो माँ
अपने सपूत को
उसी धरती के गर्भ में
इस उम्मीद के साथ
की कभी तो इस धरती की
कोख से निकलेगा
उनके लाल जैसा कोई पौधा

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