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मंगलवार, 27 दिसंबर 2011

लोकतंत्र में पीजा और फेसबुकिया जेनरेशन





देश की इस दयनीय हालत के लिए जिम्मेदार ठहराया जाए तो आखिर किसको ? 64 सालों से चले आ रहे संवैधानिक प्रक्रिया और जनता द्वारा चुनकर भेजी गई सरकार के रहते भी अगर देश में भ्रष्टाचार, गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी आदि व्याप्त है, तो इसके लिए केवल संसद में बैठे नेताओं को हीं जिम्मेवार नहीं ठहराया जा सकता, इसके लिए उतनी हीं जिम्मेवार देश की जनता भी है । 15 अगस्त 1947 के दिन से लेकर 26 जनवरी 1950 के दिन तक संविधान के निर्माण में जो समय लगा उसमें संविधान निर्माताओं ने संविधान में सुधार की भी गुंजाइश रखी यानि कानून में संशोधन का अधिकार जनता के चुने प्रतिनिधियों को दिया गया । ये होना भी चाहिए था क्योंकि इतने बड़े लोकतांत्रिक प्रक्रिया वाले देश में समय-समय पर कानूनों में संशोधन की आवश्यकता होगी ऐसा वो भी मानते रहे होंगे । हलांकि देश के इतने लंबे राजनीतिक समयचक्र को मैंने तो नहीं देखा है लेकिन यह मानने लगा हूँ की पहले संविधान संशोधन से लेकर लोकपाल-लोकायुक्त बिल के संसद में लाने और इस पर बहस होने तक हमेशा हीं संसदीय व्यवस्था में परिवर्तन करने या संशोधन करने की हवा तभी चलती होगी जब जनता किसी खास तरह की मांग या विरोध को लेकर शांतिपूर्ण तरीके से हीं सही सरकार को जगाने या झकझोरने का काम करती रही होंगी । चाहे जाति आधारित आरक्षण की बात हो या समग्र विकास की बात, चाहे सर्वशिक्षा की बात हो या स्वास्थय सुविधाओं की बात, चाहे पूर्ण पौषाहार की बात हो या समता के अधिकार की बात, चाहे सूचना के अधिकार की बात हो या लोकपाल-लोकायुक्त की बात हर समय शायद आज जैसा हीं माहौल रहा होगा कभी सरकार को बड़े विरोध का सामना करना पड़ा होगा तो कभी छोटे विरोध का । खैर जो भी हो इतने लंबे समयांतराल में मैने जब से होश संभाला है मुझे बस यही लगता रहा है कि लोकतंत्र में सबसे ज्यादा जिम्मेदारी का काम अगर किसी के पास है तो वह है जनता जो पहले तो अपने लिए काम करे, फिर समाज के लिए, फिर गाँव के लिए शहर के लिए, फिर राज्य के लिए और फिर देश के लिए । जिम्मेदारी का इतना हीं बोझ जनता के उपर नहीं है यह तो केवल शुरूआत है अब दूसरी जिम्मेदारी, जनता अपने क्षेत्र, राज्य और देश के लिए सही उम्मीदवारों का चयन करें जो उनके हीं उपर हुकुमत करने के योग्य हो, फिर जनता समय-समय पर उनको अपनी जिम्मेवारी का अहसास भी कराते रहें, और मौका पड़ने पर अपने उसी शासक के सामने हाथ पसारकर अपने अधिकारों की मांग भी करें । सही माने तो बड़ी जिम्मेदारी का काम अपने हाथ में ले लिया है जनता ने और इसलिए इसके दोहरे परिणाम भी लोकतंत्र में जनता को मिल रहे हैं । जयप्रकाश आंदोलन के समय को मैने नहीं देखा लेकिन हमें अन्ना के इस आंदोलन से ऐसा लगने लगा है कि शायद हमारे ये शासक किसी भी जनआंदोलन के बाद बहुत कम समय के लिए जगते हैं । जग भी जाते हैं तो क्या फायदा शर्तों की राजनीति शुरू होने लगती है । जनता की आवाज की ताकत इनके कानों तक पहुँचती तो है, लेकिन इतना छनकर की वो खुद उसमें से अपने फायदे का मक्खन निकालकर और बाकि का दूध जनता को वापिस कर देते हैं । फिर पनपता है भ्रष्टाचार, गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा जैसे कई अन्य परेशानियों का वह बरगद जिसकी जड़ों ने लोकतंत्र की जमीन में अपनी वो जगह बना ली है कि इस बरगद के पौधे को काटकर इसकी जड़ में मठ्ठा भी ड़ाल दिया जाए तो भी उसकी नई शाखाऐं पनपने लगती है । अपने काम को जल्द पूरा कराने के प्रयास में शायद या फिर अपने स्वार्थ सिद्धी की आश में शायद किसी ने पहली बार इन शासकों के हाथ में लक्ष्मी थमाई होगी फिर तो यह सिलसिला चल निकला होगा और आजतक निर्विरोध चलता चला आ रहा है । त्रस्त जनता जब इससे उबरने के लिए अपने आकाओं के आगे हाथ फैलाती है, तो पहले उनके हाथों को कुचलने का प्रयास किया जाता है, लेकिन जब हाथ बहुसंख्यक होने लगते हैं तो फिर आकाओं की हिम्मत टूटने लगती है और हाथों को कुचलने का विचार छोड़कर ये बातें संसद में विचार के लिए लायी जाऐंगी ऐसा आश्वासन दिया जाता है यानी जनता को शासक का लालीपॉप । उन आकाओं को पता है कि संविधान में कानून बनाने का अधिकार केवल उन्हीं के पास है वो अल्पसंख्यक हैं तो क्या हुआ देश की अरबों की आबादी के भाग्य का फैसला वो हीं करने के लायक हैं । चाहे जनता तिरंगा लेकर देश के गली-मुहल्ले तक में क्यूँ न उतर पड़े । चाहे एक बेदाग बुढ़ा जिसके बदन पर भ्रष्टाचार का एक भी छींटा नहीं पड़ा है वो अनशन पर क्यूँ न बैठा हो, लेकिन इन दागदार आकाओं को इतने पर भी केवल जनता की बेवसी दिखती है । मैं अन्ना के आंदोलन का समर्थन करता हूँ या नहीं इससे फर्क नहीं पड़ता लेकिन मैं उन मुद्दों का समर्थन जरूर करता हूँ जिसको उठाने का साहस अन्ना और देश की तमाम जनता ने किया है, मालूम नहीं की देश को इन समस्याओं से निजात मिल पायेगा या नहीं लेकिन इस आंदोलन ने एक बात तो तय कर दी है कि पीजा और फेसबुकिया जेनरेशन जैसे शब्दों से नवाजे जा चुके आज के युवा भी देश में इस तरह की क्रांति में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते हैं और इतनी क्षमता रखते हैं कि कभी भी सरकार की आँखों से नींद गायब कर दें । सलाम है इसके लिए लोकतंत्र को, सलाम है देश की जनता को साथ हीं साथ तहेदिल से शुक्रिया अदा करता हूँ देश की पीजा और फेसबुकिया जेनरेशन का ।

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