रविवार, 11 दिसंबर 2011

चाँदग्रहण पर विशेष




कल रात को गौर से चाँद में तुम्हें देखना चाहता था
तुम पहले ओझल थी फिर आधी दिखी फिर पूरी नजर आई,
तलाश रहा था चाँद में हर लम्हा तेरे चेहरे की परछाई
कभी परछाई काली थी फिर लाल हुई फिर सफेद हो गई,
ताकता रहा निरंतर उसकी तरफ एकटक होकर
पीछे से किसी ने कहा नीचे आ जाओ
ग्रहण चांद को लगी है उसे देखा नहीं करते........
( गंगेश कुमार ठाकुर)

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