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शनिवार, 31 मार्च 2012

गांव अब गांव नहीं रहा


दरवाजे पर का वो, पेड़ अब ठूंठ हो गया है
कभी इस पर चढ़कर, खेला करते थे हम
मोटी वाली टहनी पर, घनी पत्तियों के मध्य
बसेरा होता था, गौरेये का जो घोंसला बना कर रहती थी
जब आम के इस पेड़ पर, बौर आता था
सच बताऊं सुबह की नींद से, जगाने के लिए
इसी डाली पर बैठकर, कोयल कुहू-कुहू करती थी





फाल्गून के महीने की, वो ठंढ़ और उस पर
कोयल की वो आवाज, कितनी मादक होती थी
बहुत समय गुजारा था मैंने, अपने दोस्तों के साथ
काफी अरसे बाद, गांव आया हूं
लेकिन हैरान हूं , मौसम तो वही है
पर अब गांव बदल गया है
कोयल की आवाज, नहीं सुनी है मैंने








पापा कहते हैं कि कुछ सालों से
दीमक लग गया था पेड़ को
पहले पेड़ की साखें सूखी, फिर पेड़ की पत्तियां
फिर पूरा पेड़ ठूंठ बन गया
पेड़ की काफी लकड़ियां तो जलकर
घर के चुल्हे में राख हो गई है
अब बस ठूंठ भर पेड़ हीं तो खड़ा है दरवाजे पर
न जाने वो गौरेया कहां चली गई
कहां बसा लिया उसने अपना आशियाना
कोयल भी अब नहीं गाती है, बैठकर इस ठूंठ पर
सब कुछ उजड़ सा गया है
मानो अब गांव की सुबह को इनकी जरूरत ही नहीं
लेकिन मेरे अंदर आज भी जिन्दा है
वह गांव की सुनहरी यादें








लगता है मैं किसी दूसरे गांव चला आया हूं
जहां सिर्फ उदासी है, मातम है, वेदना है
अच्छा तो अब समझ पाया हूं मैं
यहां तो सब संवेदना शुन्य हैं, गांव भी और लोग भी
एक मैं हीं तो था जो समझता था, उस पौधे की अहमियत






उस गौरेये का बसेरा मुझे ही तो पसंद था
और वो कोयल सिर्फ मेरे लिए ही तो गाती थी
मैं चला गया तो समाप्त हो गई थी वो संवेदना
अब मैं वापिस आ भी गया हूं, तो भी नहीं कर सकता कुछ
क्योंकि आम का वो पेड़ तो ठूंठ हो गया है ।

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