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मंगलवार, 9 जुलाई 2013

प्राकृतिक आपदा से मानवता का क्या लेना-देना

भारत में बच्चों की जो पहली पाठशाला घर से शुरू होती है उसमें अक्षरों, शब्दों से ज्यादा मानवता का पाठ पढ़ाया जाता है। शायद यही वजह है कि विश्व के हर देश के नागरिक भारत से मानवता का पाठ सिखने के लिए यहां आते हैं। लेकिन ग्लोबलाइजेशन के बाद भारत की सभ्यता और संस्कृति में जिस तरह का परिवर्तन हुआ उसका स्पष्ट और ताजा उदाहरण हाल ही में उत्तराखंड में आई आपदा पर मर रही मानवता बनकर उभरी। देश के किसी भी कोने से लोगों के लिए दुआओं के हाथ नहीं उठे और अगर उठे भी तो इतने की वो नाममात्र के थे। सहायता के नाम पर अगर देश के कोने-कोने से कुछ चीजें भेजी भी गई तो उसमें भी राजनीति जिस राज्य ने सहायता दी वह अपने राज्य के लोगों को बचाने के लिए या उनकी सहायता करने के लिए दी। यानि सारा खेल वोट बैंक की राजनीति के नाम। लोग सहायता भी नाम और शोहरत बटोरने के लिए कर रहे थे ताकि इसका फायदा उनको और उनकी पार्टी को आगामी लोकसभा और विधानसभा चुनाव में मिल पाए। आमजन महंगाई की मार से त्रस्त है इसलिए उसके हाथ भी अपनी आवश्यकता की पूर्ति में ही उठते हैं लोगों की सहायता तो तब होगी जब उनके पास इस महंगाई से लड़ने के बाद कुछ बच पाएगा।
ये बात बहुत पहले की नहीं है, जब देश के किसी हिस्से में आई आपदा पर पूरे देश के लोग सहायता के लिए दौड़ पड़ते थे। लोग गांव-गांव, शहर-शहर, दरवाजे-दरवाजे घूम कर पैसा, कपड़ा, बर्तन, दवा तथा रोजाना इस्तेमाल के अन्य सामान इकट्ठा करते थे और फिर इन सामानों को राहत एवं पुनर्वास के काम में लगी स्वयंसेवी एजेंसियों के द्वार आपदा पीड़ितों तक पहुंचाते थे, लेकिन पिछले कुछ सालों में स्थिति बदल गई है। अब सहायता के लिए कोई राष्ट्रव्यापी पहल नहीं होती। उत्तराखंड में तबाही और बर्बादी बहुत बड़े पैमाने पर हुई है। अनुमान के मुताबिक मृतक संख्या कई हजार तक है। अरबों की संपत्ति नष्ट हो गई। फिर भी देश में प्रतिक्रिया एकदम सुस्त। सहायता के प्रयास हुए भी तो सिर्फ व्यक्तिगत स्तर पर , पूरा देश इसमें शामिल नहीं होता दिखा। दक्षिण और पूर्व के राज्यों ने तो अपनी सहायता ना के बराबर दी। उत्तराखंड सरकार और केंद्र सरकार ने भी सहायता के लिए कार्रवाई बहुत देर से शुरू की। आपदा आने के पंद्रह दिन बाद भी हजारों लोग विभिन्न जगहों पर फंसे हुए हैं, लेकिन बहस मदद के लिए नहीं, बल्कि इस बात के लिए हो रही है कि इस आपदा का दोष किसके सर मढ़ा जाए मानव के या प्रकृति के। निश्चित रूप से यह आपदा मानवसृजित ही थी, कारण बहुत साफ है। लगातार जंगलों और पहाड़ों को काटा गया और ये सबकुछ किया भी गया तो केवल अपने फायदे के लिए या फिर नौकरशाही के आदेशों का पालन करने के लिए। नदियों की साफ-सफाई के नाम पर करोड़ों खर्च किए गए लेकिन नदियां साफ तो नहीं हुई मानचित्र की तरह ही वास्तविकता में लकीरों की तरह बनती चली गई। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन बोर्ड भी अपनी परीक्षा में अनुतीर्ण हुआ और इसका नुकसान हुआ आम जन मानस को। राजनीतिक दलों ने आपदा का राजनीतिकरण करने के अलावा कुछ भी नहीं किया। औपचारिकता बस प्रधानमंत्री राहत कोष में दान देने की अपील कर दी गई। आश्चर्यजनक रूप से किसी दूसरे देश ने भी उत्तराखंड में फंसे हुए लोगों को बाहर निकालने के लिए मदद की कोई पेशकश नहीं की।
ऐसे में इस आपदा का विश्लेषण करें तो हम जिस नतीजे पर पहुंचे वह यह कि  देश की और देश के लोगों की संवेदनशीलता खत्म हो चुकी है। आपदा पीड़ितों को  बचाने की बारी आई तो पश्चिम बंगाल और गुजरात की सरकारें अपने-अपने राज्य के लोगों को बचाने में लग गईं। फिर इस आपदा में उत्ताराखंड के लोगों का व्यवहार भी अमानवीय रहा। उदाहरण सामने आए कि दुकानदारों ने रोजाना इस्तेमाल की चीजों का मनमाना दाम वसूला। बिस्कुट का एक पैकेट दो सौ रुपये में बेचा गया। पाव-रोटी सौ रुपये में बिकी। लूटपाट और महिलाओं के साथ छेड़खानी की वारदातें हुईं। यहां तक कि साधु और संतों ने भी मृत लोगों के पैसे और जेवरात झपटे। अगर इस राष्ट्रीय विपदा की घड़ी में किसी ने काबिलेतारीफ काम किया तो वह थी हमारी सेना और वायुसेना जो हमेश से अपने कर्तव्य का पालन पूरी निष्ठा और भरोसे के साथ करती आई है। सेना एवं वायुसेना के जवानों ने फंसे लोगों को केवल बाहर ही नहीं निकाला बल्कि लोगों को भोजन और ठहरने की जगह भी उपलब्ध कराई।
यह बात स्पष्ट तौर पर इशारा करती है कि भारत हृदयविहीन देश बन गया है। पिछले कुछ सालों में इसके लोगों में नैतिक मूल्यों का भरपूर पतन हुआ है। कमजोर विकास और निराशाजनक भविष्य की यह हालत राजनीतिक दलों के कारण बनी है। राजनीतिक दलों ने पूरे भारत की तस्वीर को सामने रखे बगैर या हर क्षेत्र या हर इलाके की बात सोचे बिना सिर्फ अपने धन और कुर्सी की चिंता की है। भारत के पास अपनी सभ्यता, संस्कृति, मानवीय संवेदना और नैतिक मूल्यों को बचाए रखने के बहुत ज्यादा अवसर नहीं हैं। जिस गति से हमारे नैतिक मूल्यों का पतन हो रहा है उससे बड़े पैमाने पर हमारी बर्बादी सुनिश्चित है।

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