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मंगलवार, 9 जुलाई 2013

हमारे बच्चे क्या देख पाएंगे प्रकृति की खूबसूरती ?

गंगेश ठाकुर  
मनुष्य   को ईश्वर ने जो सबसे बेहतरीन तोहफा दिया है उसका नाम है  पर्यावरण। इस तोहफे की सजाने संभालने का काम मनुष्य सहजता से कर लें,  इसलिए हमारे धर्म में धरती को माता,  नदियों को देवी और वृक्षों को देवता की संज्ञा दी है। वट सावित्री, हरियाली अमावस्या जैसे त्योहार मनाने की परंपरा वृक्षों का महत्व बताने के लिए ही प्रारंभ की गई होंगी। हर धर्म का एक ही उद्देश्य है वह है पर्यावरण और प्रकृति की रक्षा करने का सबक देना। अगर धर्म के इन सिद्धांतों का हमने आधा  भी पालन किया होता तो शायद आज हमें अपनी धरती पर आने वाले संकटों की चिंता ना सता रही होती। धर्म के माध्यम से प्रकृति की रक्षा करने के स्थान पर हमने कई बार धर्म के नाम पर इससे उल्टा व्यवहार किया है।
वर्ल्ड अर्थ डे यानि कि विश्व धरा दिवस पर हम यदि धर्म की आड़ में प्रकृति को पहुंच रहे नुकसान की गंभीरता को स्वीकार करें तो यह दिन मनाना हमारे लिए सार्थक होगा। किसी भी धर्म के अनुसार केवल मिट्टी, पीतल, तांबे या चांदी की प्रतिमा को ईश्वर का स्वरूप मानकर पूजा की जाती है यानि कि प्लास्टर ऑफ पेरिस की बनी प्रतिमाओं का पूजन करने के बाद, हमें पूजन का वास्तविक फल प्राप्त नहीं होता है। ऐसा हम नहीं धार्मिक व्याख्या ही कह रही है। ऐसे में प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनी प्रतिमा को जल में विसर्जित कर हम केवल जल को नहीं बल्कि अपने आप को और साथ ही साथ जलचर, थलचर सभी जीव जंतुओं को धीरे-धीरे मौत की तरफ ले जा रहा हैं। पहले केवल मिट्टी की प्रतिमाओं को ही जलस्त्रोतों में विसर्जित किया जाता था। इन प्रतिमाओं को प्राकृतिक ढंग से तैयार किये गए रंगों से रंगा जाता था। जब ये प्रतिमाएं जलस्त्रोतों में विसर्जित की जाती, तो जल के भीतर इनका पूर्ण अपघटन हो जाता था। जिससे जलस्त्रोत को जरा भी हानि नहीं पहुंचती थी। लेकिन आज के परिदृश्य में देखे तो प्लास्टर ऑफ पेरिस की बनी और ऑयल पेंट से पोती गई प्रतिमाएं पानी में पूर्ण रूप से अपघटित नहीं हो पाती है।
हमेशा ही हंसता, मुस्कुराता, खिलखिलाता बचपन देखकर मन आनंदित हो उठता है पर पर्यावरण की स्थिति देख आनेवाले बचपन के भविष्य हेतु मन चिंतित हो उठता है पूरा विश्व आज पर्यावरण प्रदूषण ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्याओं से जूझ रहा है । ये समस्यायें जहॉ दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है वहीं यह मुंह फाड़े हमारे पर्यावरण और विकास को निगलती जा रही हैं । हमने अपने विकास के नाम की ऐसी खाई खोद खुद के लिए खोद दी कि हमारे पर्यावरण का हर कोना प्रदूषित हो गया। हम सब यह जानते हैं किन्तु हमेशा अंजान बनकर बार-बार वही करते हैं जो हमें नहीं करना चाहिए । अगर हम गणना शुरू कर दें तो पृथ्वी के निर्माण के बाद से हमारे किवास के प्रारंभ से अब तक की दुर्घटनाओं पर गौर करें तो दुर्घटनाएं इतनी की पूरी लाइब्रेरी बन जाए और इसके लिए जिम्मेवार कौन सिर्फ हम और सिर्फ हम। विकास और प्रकृति को एक साथ कदम से कदम मिलाकर चलाने की कोशिश करनी होगी और प्रकृति और पर्यावरण इन शब्दों के महत्व को समझना और समझाना होगा । ताकि भविष्य अंधकारमय होने से बचा रहे । आज पर्यावरण प्रदुषण और प्रकृति के साथ किए गए हमारे भेदभाव ने स्थिति को इतना विकराल रूप धारण करने पर मजबूर कर दिया है कि हम थोड़े से असावधान हुए नहीं और बड़ी-बड़ी घटनायें घट जाती हैं। हाल ही में उत्तराखंड में आए प्राकृतिक आपदा के लिए भी हम ही जिम्मेवार थे पहाड़ों को उपनी सुविधा के लिए जिस तरह हमने उजाड़ा था उसका खामियाज ही तो हमें भुगतना पड़ा। प्रकृति मानवता पर कहर बनकर गिरी और देखते ही देखते उत्तराखंड तबाह हो गया। आदमी की छेड़-छाड़ से प्रकृति इतनी ख़फा हो जाती है कि वह खुद अपनी बची सुंदरता भी उजाड़ देना चाहती है प्रकृति का कुछ ऐसा ही तांडव हाल ही में उत्तराखंड में हुआ है। प्रदूषण का अर्थ है प्राकृतिक संतुलन में दोष पैदा हो जाना है शुद्ध वायु, शुद्ध जल, शुद्ध खाद्य पदार्थ और शांत वातावरण का न मिलना ही प्रदूषण है। हमारा पर्यावरण सबसे अधिक प्रभावित हमारे बालजीवन को ही करता है। बालकों की जिज्ञासा और सीखने की ललक उन्हें पर्यावरण और प्रकृति के प्रति आकर्षित करती हैं। उषा की लालिमा, लता-विटपों-वृक्षों की हरीतिमा, सरिता का कलकल नाद, धरा से अंबर का मिलन कराने की चेष्टा करने वाली पर्वत श्रेणियाँ बालकों के बालपन को जहाँ आह्लादित करती हैं वहीं उनके हृदय में भावनाओं तथा संवेदनाओं को जन्म देती हैं।
आज जमीन के गर्भ से विभिन्न खनिजों को प्राप्त करने के लिए और भूमि तथा पवर्तों को खोद डाला गया है और यह उत्खनन कार्य द्रुत गति से हुआ ही जा रहा है, जंगलों के वृक्षों को काट डाला गया है और बड़ी तेजी के साथ अभी भी काटा जा रहा है, सरिता के स्वच्छ जल में कारखानों की गंदगी को मिला दिया गया है और दिन-ब-दिन गंदगी बढ़ती ही जा रही है। क्या हमारे इन कामों से प्रकृति का क्षरण और पर्यावरण का विनाश नहीं हो रहा है? हम इतने स्वार्थी हो गए हैं कि प्रकृति से सिर्फ कुछ न कुछ चाहते हैं और जिस प्रकृति से हमें कुछ न कुछ मिल रहा है उसकी प्रकृति के सन्तुलन के विषय में कुछ भी नहीं सोचते। आज हममें से अधिकतर लोगों की आनेवाले वंशजों के लिए या अभी के वर्तमान वंशजों के लिए प्रकृति का सौन्दर्य दर्शन दुर्लभ हो गया है क्योंकि हमने अपने चारों ओर सीमेंट और कंक्रीट का जंगल बना डाला है। पर्यावरण सदैव से मानव तथा उसके जीवन को प्रभावित करता रहा था, करता रहा है और करता रहेगा। हमारे पर्यावरण का अस्तित्व प्रकृति के कारण ही संभव है किन्तु दु:ख की बात है कि आधुनिकता की दौड़ में अंधे होकर हम प्रकृति को ही नष्ट किए जा रहे हैं। प्रकृति नष्ट होगी तो पर्यावरण भी प्रदूषित होकर नष्ट हो जाएगी जिसका परिणाम मानव के नाश के रूप में ही दृष्टिगत होगा। मानव का पूर्ण नाश तो जब होगा तब होगा, किन्तु प्रकृति के नाश तथा पर्यावरण के प्रदूषण ने हमारे बच्चों के बचपन का नाश करना अभी से ही जारी कर दिया है। यदि हमें हमारे बच्चों के बचपन को बचाना है तो हमें हमारे पर्यावरण को बचाना ही होगा।

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