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शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

इतिहास और पुस्तकों से है प्यार तो यहां घुम आइए सरकार

रज़ा पुस्तकालय में उनकी मूल्यवान सम्पत्ति के रूप में कई ताड़ (खजुर) के पत्तों पर लिखी गई पांडुलिपिया है, उनमें से कई तेलगू, संस्कृत, कन्नड़, सिनहाली और तमिल भाषा में है। इसलिए अगर आपको विश्व के पुरातन साहित्य, समाज, दर्शन, धर्म, कला, संस्कृति को जानना है तो आपको यहां पर आना होगा। आप कभी भी इस पुस्तकालय में आकर इन चीजों से अपने आप को मिला सकते हैं। इसलिए कहता हूं इतिहास और पुस्तकों से है प्यार तो यहां घुम आइए सरकार।
     



हिंदी फिल्मों में चाकू-छूरी के लिए प्रसिद्ध और लोगों की जुबान पर हमेशा बसे रहने वाले रामपूरी को कौन नहीं जानता जी हां साहब यह रामपुरी इसी जिले की देन है। हालांकि उत्तर प्रदेश के इस जिले ने कई सारे फनकारों, कलाकारों और प्रतिभा सम्पन्न लोगों से देश को नवाजा। उत्तर प्रदेश राज्य का यह जिला नवाबों की नगरी के नाम से भी जाना जाता है। यहां के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से है रामपुर किला, रामपुर राज़ पुस्तकालय और कोठी खास बाग। इस शहर का कुल क्षेत्रफल 2367 वर्ग किलोमीटर है। यह जिला बरेली जिले के पूर्व,  मुरादाबाद जिले के पश्चिम,  बादौन जिले के दक्षिण और उधम सिंह नगर जिले के उत्तर में पड़ता है। रामपुर की स्थापना नवाब फैजुल्लाह खान ने की थी। उन्होंने 1774-1794 तक यहाँ शासन किया।
रामपुर नगर ही इस ज़िले का प्रशासनिक केंद्र है तथा यह कोसी के बाएँ किनारे पर स्थित है। रामपुर नगर में उत्तरी रेलवे का स्टेशन भी है। रामपुर का चाकू उद्योग प्रसिद्ध है। चीनी, वस्त्र तथा चीनी मिट्टी के बरतन के उद्योग भी नगर में हैं। रामपुर नगर में अरबी भाषा की शिक्षा के लिए एक महाविद्यालय है। रामपुर रज़ा पुस्तकालय, इन्डो इस्लामी शिक्षा और कला का खाज़ाना है­! नवाब फैज़ उल्ला ख़ान द्वारा 1774 में स्थापित किए गए केंद्र पर उनकी विरासत को संग्रहित कर पुस्तकालय का गठन कर दिया गया। बहूमूल्य पांडुलिपियों के साथ ऐतिहासिक दस्तावेज़ों,  मुग़ल काल के लघु चित्रों,  किताबों और कला के अन्य सामानों को नवाब के तोषाख़ाने के बगल में रखा गया है। नवाब यूसुफ अली ख़ान ‘नाजि़म एक साहित्यिक व्यक्ति और उर्दू के प्रसिद्व कवि मिर्ज़ा ग़लिब के शिष्य थे। उन्होंने पुस्तकालय में एक अलग विभाग बनाया और उसके नवनिर्मित कमरों में संग्रहित सामानों को स्थानांतरित कर दिया। नवाब ने जाने मान ज्ञात सुलेखकों, प्रकाश डालने वाले विद्वानों, जिल्द चढ़ाने वालों को कश्मीर और भारत के अन्य भागों से आमंत्रित किया बाद में नवाबों द्वारा सग्रंह को लगातार समृद्ध किया जाता रहा।
रामपुर रज़ा पुस्तकालय दुनिया की एक शानदार,  सांस्कृतिक विरासत और ज्ञान का खजाना है। यह बहुत दुर्लभ और बहुमूल्य पांडुलिपियों,  ऐतिहासिक दस्तावेज़ों,  इस्लामी सुलेखों के नमूनों,  लघुचित्रों,  खगोलीय उपकरणों,  अरबी और फारसी भाषा में दुर्लभ सचित्र काम के अलावा 60,000  मुद्रित पुस्तकों के संग्रह के लिए जाना जाता है। कहते हैं प्रथम स्वत्रन्त्रता संग्राम के बाद 1857 में प्रख्यात कवियों, लेखकों और विद्वानों की एक बड़ी संख्या रामपुर आकर बस गयी थी। नवाब कल्बें अली खान 1865-1887ने यहां पुस्तकालय में दुर्लभ पांडुलिपियों,  पेंटिग्स,  और इस्लामी सुलेखों के नमूनों के संग्रह में गहरी रूचि दिखाई, वह खुद एक प्रख्यात विद्वान और कवि थे,  उन्होंने दुर्लभ हस्तलिपियों,  पेंटिग्स और मुग़ल और अवध पुस्तकालयों के कला के टुकड़ों को संरक्षित करने के लिए एक समिति बनायी। यह समिति पांडुलिपियों की जाँच किया करते थी। जब नवाब हज यात्रा करने गए तो वहाँ से क़ुरान मजीद की अद्वितीय चर्मपत्र 7वीं शताब्दी ई. की हिजरी 661 जिसको जनाब हज़रत अली की हस्तलिपि माना जाता हैं साथ लाए,  इस प्रकार पुस्तकालय संग्रह को अत्यधिक समृद्ध किया गया।
नवाब हामिद अली खानन  ने राज सिंहासन पर बैठने से पहले कई देशों का दौरा किया वह अत्यन्त शिक्षित और एक विपुल भवन निर्माता थे, उन्होंने प्रभावशाली महलों, किला प्राचीर और राज्य इमारतों का रामपुर राज्य में निर्माण कराया। उन्होंने 1904 में किले के अन्दर इन्डो-यूरोपियन शैली में हामिद मंजिल नाम से एक शानदार हवेली का निर्माण कराया। इसके बाद रज़ा पुस्तकालय 1957 में एक शानदार इमारत में स्थानांनतरित कर दिया गया। भारत में सन 1949 में रामपुर राज्य के विलय के बाद पुस्तकालय के प्रबंधन को एक ट्रस्ट के द्वारा जारी और नियनित्रत किया गया जिसे 1951 में 06 अगस्त को बनाया गया था ट्रस्ट का प्रबन्घन जुलाई 1975 तक जारी रहा। भारत सरकार के शिक्षा और वैज्ञानिक अनुसंघान के राज्यमंत्री प्रो.एस.नुरूल हसन बार बार पुस्तकालय आये और इस अनमोल विरासत की उपेक्षित हालत का गम्भीरता से अवलोकन किया उनके कहने पर बेहतर प्रबन्घन के लिए उपयुक्त उपायों को लागू कर के वित्तीय अनुदान प्रदान किया, परिणाम के रूप में 1975 में भारत सरकार ने संसद के अघिनियम के तहत पूर्ण घन कोष और प्रबन्घन अपने अघीन कर लिया तब पुस्तकालय केन्द्रीय सरकार द्वारा नियन्त्रण में ले लिया गया। अब यह पुस्तकालय एक राष्ट्रीय महत्व की संस्था के रूप में भारत सरकार के सांस्कृतिक विभाग के अधीन एक स्वायत्त संस्था के रूप में हैं और पुरी तरह केन्द्र सरकार द्वारा वित्त पोषित है। पुस्तकालय में कई पुरानी कला वस्तुएं और दुर्लभ खगोलीय उपकरण है। संग्रह में सबसे पुराना उपकरण सिराज दमिश्क का हिजरी 615 (1215 ई.) में बनाया (ग्रहों की स्थिति जानने वाला) खगोलीय उपकरण है। पुस्तकालय में तेरहवीं शताब्दी ई. के बगदाद के प्रवीण लेखक ‘याकूत-अल-मुस्ता के द्वारा लिखे क़ुरान की प्रति है। यह सोने और कीमती लाजवर्द पत्थर रंग में अलंकृत है। रामपुर रज़ा पुस्तकालय को कलात्मक मूल्य के महान साहित्य की एक सौ पचास सचित्र पांडुलिपियों के अघिकार का गौरव प्राप्त है। ये चित्र समकालीन जीवन शेली, कला, वास्तुकला, रीतिरिवाज और आभूषण इसके अलावा स्थलाकृतिक विवरण, वनस्पति, जीव और परम्परागत संगीत वाद्य आदि पर प्रकाश डालता है। बाल्मीकि की एक अनूठी सचित्र रामायण सुमेर चन्द द्वारा फारसी में अनुवादित की गई, हिजरी सन् 1128(1715-16ई.) में फारूख सियार के शासनकाल में जिसकी प्रति भी यहां सुरक्षित है।  उल्लेखनीय संस्कृत पांडुलिपियों में से, प्रबोघ चक्रवर्ती का व्याकरण पर कार्य का उल्लेख कर सकते है, यह बैजनाथ देव चौहान वंशी द्वारा लिखति है और गिरघारी लाल मिश्रा द्वारा लिपिक है। रज़ा लाइबेरी संग्रह का एक और घ्यान आकर्षित करने वाला पहलू है, फारसी लिपि में लिखी हज़ारों हिन्दी पांडुलिपियां यहां रखी हैं। मलिक महाजन की मघुमती की पुरी किताब हाल ही में पुस्तकालय द्वारा प्रकाशित साथ ही संरक्षित भी की गयी है इसके अलावा मलिक मुहम्मद जायसी की पद्मावत फारसी अनुवाद के साथ पुस्तकालय के संग्रह की खासियत है। रज़ा पुस्तकालय में उनकी मूल्यवान सम्पत्ति के रूप में कई ताड़ (खजुर) के पत्तों पर लिखी गई पांडुलिपिया है, उनमें से कई तेलगू, संस्कृत, कन्नड़, सिनहाली और तमिल भाषा में है। इसलिए अगर आपको विश्व के पुरातन साहित्य, समाज, दर्शन, धर्म, कला, संस्कृति को जानना है तो आपको यहां पर आना होगा। आप कभी भी इस पुस्तकालय में आकर इन चीजों से अपने आप को मिला सकते हैं। इसलिए कहता हूं इतिहास और पुस्तकों से है प्यार तो यहां घुम आइए सरकार।

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