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शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

बच्चे मरे हैं सियासत नहीं शोक मनाओ

सरकार की मिड-डे मील योजना की पोल खुलने के बाद इस पर अफसोस कम और सियासत ज्यादा होने लगी है। साहनुभूति के शब्द नहीं बोले जा रहे लेकिन आरोपों की खंजर चलाई जा रही है। सत्ता के लोभ और नीजी लाभ के मद में अंधे ये लोग मासूमों की मौत को भी सियासत का अखाड़ा समझ उस पर कुश्ती खेल रहे हैं। दु:ख इनको मासूमों की मौत का नहीं है परेशानी विपक्ष के साजिश से जुड़ी हुई है। वाह रे देश जहां सत्ता मासूमों के मौत पर भी खेल खेलती है। ऐसे देश में लोकतंत्र का अर्थ ही खोता जा रहा है लोकतंत्र धीरे-धीरे सियासीतंत्र में तब्दील होता जा रहा है।


केंद्र सरकार की मिड-डे मील योजना हमेशा से विवादों में रही। केंद्र सरकार द्वारा देश के सभी राज्यों में चलाई जा रही इस योजना में केंद्र और राज्य दोनों सरकारों की भागीदारी है पर इसकी देख-रेख का काम राज्य सरकारों का ही है। केंद्र सरकार इस योजना को चलाने के लिए राज्यों को अपनी तरफ से अनुदान देती है। जब से इस योजना की शुरुआत हुई इस योजना की कई खामियां उजागर होकर सामने आ गई। मिड-डे मील या मध्याह्न भोजन योजना के तहत सरकार द्वारा देश के तमाम बच्चों को स्कूल में दोपहर के भोजन का प्रावधान बनाया गया। लेकिन राज्यों में इसके पालन के साथ कई ऐसे मामले घटित हुए जिसने सरकार के इस योजना के कार्यान्वयन की शैली पर सवाल खड़े कर दिए।
मिड डे मील योजना की शुरुआत साल 1995 में हुई लेकिन अधिकतर राज्यों ने इस योजना के नाम पर मासिक आधार पर कच्चा अनाज देना शुरु किया। अदालत ने 28 नवंबर 2002 को इसका संज्ञान लेते हुए आदेश दिया कि बच्चों को योजना के तहत पकाया हुआ भोजन दिया जाय।
फिर इस योजना में संशोधन साल 2004 के सितंबर में हुआ और इसे सभी जगह लागू कर दिया गया। इस योजना के तहत केंद्र सरकार ने सभी सरकारी विद्यालयों, स्थानीय निकायों द्वारा संचालित स्कूलों और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों के कक्षा एक से पांच तक के छात्रों को पकाया हुआ भोजन देने के लिए प्रति छात्र प्रतिदिन एक रुपये का खर्च अपनी तरफ से देना मंजूर किया। इस योजना का सरकार के पास जब ऑडिट रिपोर्ट पहुंचा तो इसकी ढ़ेर सारी खामियां उजागर हुई। इसमें सबसे मुख्य खामी यह भी है कि शिक्षकों को भोजन पकाने के काम की देखभाल करने में काफी समय खर्च करना पड़ता है और इससे उनके अध्यापन के कार्य असर पड़ता है।
इस योजना के प्रभाव में आने के बाद से देश की तमाम जनता जो खासकर गरीब तबके से थे वो अपने बच्चों को शिक्षा के उद्देश्य से नहीं केवल दोपहर के भोजन पाने के लिए स्कूल भेजने लगे। बच्चे दोपहर के भोजन के बाद शायद ही स्कूलों में दिखते होंगे ऐसा हर जगह देखा जाने लगा। देश में जिस तरह के हालात हैं ऐसे में गरीब बच्चों के लिए शिक्षा से ज्यादा जरूरी एक वक्त का भोजना था चाहे वह स्कूल को आधे वक्त का समय देकर ही क्यों न पाया जाए।
हाल ही में बिहार के एक सरकारी प्राथमिक विद्यालय में इस योजना की वो कड़वी सच्चाई बयां कर दी जो शायद लोग जानकर भी चुप थे। इस योजना के तहत दिए गए विषाक्त भोजन ने 27 बच्चों की जान ले ली और लगभग सौ बच्चे की हालत गंभीर हो गई। देश में इस त्रासदी से बवाल नहीं मचा लेकिन सियासत का खेल जरूर शुरू हो गया केंद्र और राज्य सरकार अपने बयानों में एक दूसरे की निंदा करते नहीं अघाए। केंद्र और राज्य में विपक्षी पार्टियां और अन्य दल भी निजी लाभ के लिए आरोप-प्रत्यारोप का खेल खेलने लगे। लेकिन इस पूरे प्रकरण में आम लोगों के लिए इनकी सोच नदारद थी। बिहार के शिक्षा मंत्री पीके शाही ने अपने बयान से मीडिया में सनसनी फैला दी कि बच्चों के खाने में जहर मिला हुआ था, जिसकी वजह से इतनी बड़ी संख्या में बच्चे मौत की नींद सो गए। आनन-फानन में प्राथमिक विद्यालय की प्रिंसिपल  का पहले तबादला किया गया और बाद में उन्हें सस्पैंड करने का निर्णय लिया गया। बिहार के छपरा में हुए इस मानवीय त्रासदी में 22 बच्चों की मौत के बाद केंद्र सरकार की ओर से भी सफाई के शब्द मीडिया के कैमरे में कैद हुए। केंद्र सरकार ने बताया की सरकार की तरफ से इसी साल मार्च महीने में बिहार को चेतावनी दी गई थी कि राज्य में बच्चों को घटिया खाना परोसा जा रहा है। मानव संसाधन मंत्रालय ने अपनी रिपोर्ट में कई शिकायतों हवाला भी दिया और साथ ही साथ कहा कि उनके द्वारा बिहार में घटिया भोजन दिए जाने पर निगरानी कमेटी बनाने को कहा गया था।  लेकिन बिहार सरकार इससे उलट इस मामले में विपक्षी दलों की साजिश का रोना रोने लगी। राज्य के शिक्षा मंत्री पी के शाही ने अपने बयान में कहा कि गांववालों ने बताया कि एक पार्टी विशेष के सक्रिय कार्यकर्ता अर्जुन राय के किराना दुकान से स्कूल में सामग्री की आपूर्ति की जाती है। अर्जुन राय उस स्कूल की प्रभारी हेड मिस्ट्रेस मीना देवी के पति हैं और एक बडे़ राजनेता के करीबी हैं।
बात केवल छपरा में मिड-डे मील खाने से 27 बच्चों की मौत के बाद हंगामे की होती तो कोई बात नहीं थी इसी बीच गया और मधुबनी में भी मिड डे मील मासूमों पर कहर बनकर टूटा। गया में मिड डे मील खाने से एक बच्चे की मौत हो गई और 22 बीमार हो गए। दूसरी तरफ मधुबनी में 50 से ज्यादा बच्चों की तबीयत बिगड़ गई। इनमें से सात बच्चों को तत्काल हॉस्पिटल में भर्ती काराया गया। उधर, देश के दूसरे कोने से  महाराष्ट्र के एक स्कूल से भी 31 बच्चों के मिड-डे मील खाने के बाद बीमार पड़ने की खबर आ गई। जिसने केंद्र सरकार की इस योजना और इसके सुरक्षा उपायों के सारे पोल खोल दिए। सरकारी स्कूलों में छात्रों की संख्या बढ़े इसके लिए दोपहर में उन्हें खाना खिलाना शुरू किया गया था, अब जब यही भोजन खा कर बच्चों की जान जा रही है तो सवाल उठता है कि यह महज एक हादसा है या फिर स्कूलों की बदइंतजामी का नतीजा। 

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