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गुरुवार, 19 अगस्त 2010

मंहगाई अब हमारी सौतन

मंहगाई तो अब हमारी सौतन बन गई है । आज जहाँ भी हम देखते हैं ,मंहगाई मुँह बाये शैतान की तरह हमारा खात्मा करने पर तुली है। हाँ ये सही है की मंहगाई ऐसी नयी चीज नहीं है जिससे जनता आज दो चार हो रही है । आज के इस उपभोक्तावादी और पूँजीवादी युग में इसका असर कुछ जल्दी महसुस हो जाता है। आज की बात छोड़ दें और पीछे की तरफ मुड़कर देखें तो पता चल जाएगा की मंहगाई ड़ायन तो पहले भी डँसती थी। हिन्दी सिनेमा ने तो अपना अंदाज मंहगाई पर कुछ यूँ बयाँ कर दिया था । प्रेमी अपने प्रेमिका के तोहफे की माँग पर कुछ इस तरह समझा रहा होता है। मेरा तोहफा तूँ कर ले कबुल माफ करना हुई मुझसे भुल क्योंकि सोने पे छाई मंहगाई मैं चाँदी ले आया...........।ये तो वो जमाना था जब बात सोने चाँदी के मंहगे होने की होती थी।आज तो आलम ये है कि मंहगाई डायन बन गयी है ।इससे बचने का कोई उपाय भी नजर नहीं आता क्योंकि हम जिस समाज में जी रहे हैं वहाँ न तो सरकार मंहगाई को डायन मानती है न हीं विज्ञान कभी डायन के अस्तित्व को मानता है,तो फिर ऐसे में हम इस डायन से कैसे बच पायेंगे। मंहगाई एक ऐसा दीमक बन गया है जो हमारी अर्थव्यवस्था की जड़ को चाटता चला जा रहा है। राशन की दुकान हो या फल सब्जियों का बाजार कपड़े की दुकान हो या अन्य आवश्यक आवश्यकताओं का बाजार मंहगाई सर्वव्यापी है। इस मंहगाई की मार का असर गरीब और मध्यमवर्गीय तपके के लोगों पर देखने को मिलता है। जिनके गर्दन के उपर यह तलवार बनकर लटकती रहती है।आज तो राजनीति का खेल भी इसी मुद्दे पर खेला जा रहा है। कभी विपक्षी पार्टीयाँ मंहगाई के मुद्दे पर भारत बंद का नाटक करती हैं तो कभी संसद में इस पर चर्चा के लिए मतदान कराने की माँग को लेकर संसद की कार्यवाही में रुकावट पैदा करती हैं। सरकार सब्सिड़ी के बोझ से बचने के लिए मंहगाई की दुहाई देती है।सरकार की व्यवस्था भी खुब न्यारी है, लाखों टन अनाज गोदामों में सड़ रहा है और बत्तीस करोड़ लोगों को एक वक्त का खाना नसीब नहीं हो पा रहा है। मंहगाई दूर करने का सरकार का सारा प्रयास असफल हो गया है।उधोगपति, व्यापारी हो या व्यवसायी वर्ग सरकार के बाद मंहगाई की समस्या के लिए पूरी तरह से ये जिम्मेवार हैं। सामानों के स्टाँक पर ये कुंड़ली मार कर बैठे वो नाग हैं जिनकी वजह से मंहगाई सचमुच डायन बन गयी है। जब मंहगाई के मुद्दे पर सरकार को घेरा जाता है तो वह सब्सिड़ी और आर्थिक मंदी का देश की अर्थव्यवस्था पर असर का रोना रोते नहीं थकती हैं।
सरकार कहती है कि हम सब्सिड़ी का अतिरिक्त भार वहन नहीं कर सकते। उपर से आर्थिक मंदी से घिरे विश्व बाजार का असर भारतीय अर्थव्यवस्था और भारतीय बाजार पर स्पष्ट नजर आने लगा है।आर्थिक मंदी ने या तो रोजगार छीना या फिर वेतन में कटौती की तलवार लोगों के उपर लटका दी। ऐसे में मंहगाई ने अपना पैर फैलाना शुरु कर दिया । उपर से सरकार ने एक और तलवार जनता के सर पर लटका दी वैट की तलवार ।आर्थिक संपन्नता के इस युग में इतनी आर्थिक विपन्नता समझ में नहीं आता।आज भी आम जनता को समझ नहीं आ रहा कि मंहगाई खुद चलकर आई या लायी गयी है।गरीबों को दो वक्त का भोजन पहले मुश्किल से मिल पाता था इस मंहगाई ने तो पता नहीं उन्हें दो वक्त का भोजन पाने के लायक छोड़ा भी या नहीं। खैर सरकार की माने तो देश की अर्थव्यवस्था अन्य देशों की अपेक्षा अच्छी है जबकि पूरा विश्व आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रहा है। सरकार कभी विकास कार्यों को गति देने के नाम पर पैसे को पानी की तरह बहा रही है तो कभी कॉमनवेल्थ के नाम पर अरबों रुपये लुटा रबी है और इस खर्च का अतिरिक्त भार का वहन करने का जिम्मा जनता को दिया है।
ऐसे में कमर तोड़ मंहगाई से बचने का कोई तरीका नजर नहीं आता। अब तो पीपली लाइव का ये गाना सखि सैयाँ तो खुब हीं कमात हैं ,मंहगाई डायन खाये जात हैं। एकदम से सही लगता है।

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