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रविवार, 27 मार्च 2011

भागो वरना लोकतंत्र आ जायेगा ।





लोकतंत्र की भी अजीब स्थिति है, जहाँ है वहाँ भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, गरीबी, अशिक्षा, लाचारी भारी है। जहाँ नहीं है वहां पर इस व्यवस्था को स्थापित करने के लिए संघर्ष जारी है।जी,हाँ लोकतंत्र का रूप हीं कुछ ऐसा है। लोकतंत्र के संदर्भ में कहा जाता है कि जनता का, जनता के द्वारा ,जनता के लिए शासन की व्यवस्था केवल लोकतंत्र में ही है। लेकिन फिर भी लोकतंत्र की पूरी व्यवस्था निरर्थक लगती है।सार्थक है तो केवल लोकतंत्र और उसका नाम क्योंकि इसे कायम रखने के लिए जनता अपने बीच से नेता चून कर देश की सत्ता उनके हाथों सौंप देती है।जनता उन नेताओं के उपर भरोसा करती है और निश्चिन्त हो जाती है।जनता द्वारा सत्ता सौंपने और नेताओं द्वारा सत्ता चलाने के बीच के वक्त में आम नेता कैसे राजनेता बन जाते हैं यह तो केवल लोकतिंत्रक देश में हीं जाना जा सकता है। फिर यहीं से सत्ता में लूट-खसोट का सिलसिला शुरू हो जाता है।





लोकतंत्र निरंकुश शासन व्यवस्था नहीं है लेकिन वर्तमान परिपेक्ष्य में देखा जाए तो एक कहावत लोकतंत्र के लिए बहुत सटीक है। लोकतंत्र वह मिठी छूरी है जो जनता के गर्दन पर हर रोज राजनेताओं द्वारा चलाई जाती है लेकिन जनता को दर्द का एहसास तब होता है जब जनता पूरी तरह से इसके असर को झेल चूकी होती है। अच्छाई और बुराई एक सिक्के के दो पहलू है ऐसे में लोकतंत्र से भी केवल अच्छाई की अपेक्षा गलत है लेकिन यह व्यवस्था अपने निरंकुश नहीं होने की वजह से चंद लोगों द्वारा इतनी जल्दी गन्दी कर दी जायेगी यह समझ पाना थोड़ा मुश्किल लग रहा है।






हलांकि लोकतंत्र का स्वरूप हर जगह इतना गंदा अभी नहीं हुआ है। लोकतंत्र ने जनता को कुछ-कुछ ऐसे अधिकार दिये हैं कि लगता है कि इससे अच्छी शासन व्यवस्था की कल्पना नहीं की जा सकती है। स्वतंत्रता का अधिकार, समानता का अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार, संस्कृति और शिक्षा का अधिकार, शोषण के विरूद्ध अधिकार, संवैधानिक उपचार जैसे मौलिक अधिकारों को प्राप्त करने के लिए जनता के पास एक हीं शासन व्यवस्था है जिसका नाम लोकतंत्र है।शायद इसीलिए विश्व के कई देश लोकतांत्रिक व्यवस्था से जुड़े हुए हैं। लेकिन इससे अलग हटकर देखा जाऐ तो विश्व का हर बड़ा लोकतंत्र जनता को उनके अधिकारों से तो नवाजता है, लेकिन उन लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले देश में भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, गरीबी, अशिक्षा, सांस्कृतिक पतन जैसी तमाम समस्याऐं मुँह बाये खड़ी होती है।







विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में ही देख लें तो स्थिति स्पष्ट हो जायेगी जहाँ इन मौलिक अधिकारों के साथ हीं जनता को कई नए अधिकार प्रदान किये गये हैं।जैसे सूचना का अधिकार, काम का अधिकार, शिक्षा का अधिकार लेकिन फिर भी हालत जस की तस है। न तो यहाँ शिक्षा व्यवस्था में सुधार है न तो रोजगार हीं पूर्णत: मुहैया हो पा रही है। लोग अगर सूचना के अधिकार का उपयोग कर रहे हैं तो उनको मार दिया जा रहा है या तो लोगों को जान का खतरा बना रहता है। हाँ इस लोकतंत्र के बीच अगर कुछ दुर्भाग्यवश पनप गया है तो वह है घोटाला, भ्रष्टाचार, उग्रवाद, सामाजिक असमानता और न जाने क्या-क्या। दूसरी तरफ आज भी देश की बड़ी जनसंख्या विकास की रोशनी से कोसों दूर है।आज इस देश के अंदर कई अनैतिक व्यवस्था पनप उठी है जैसे नक्सलवाद, माओवाद, उल्फा, लालसेना और न जाने कितने हीं ऐसे संगठन जो अपने अधिकारों को पाने के लिए शासन व्यवस्था के साथ अनैतिक संघर्ष कर रही है जो कमोवेश लोकतंत्र की विफलता को हीं दर्शाता है।







ऐसे में लोकतंत्र की स्थापना का सही अर्थ खोता जा रहा है। जो देश कम्युनिज्म, सेक्यूलर या अन्य शासन व्यवस्था में बंधे चले आ रहे हैं।उन्हें लोकतंत्र के छाँव तले कुछ ज्यादा हीं अच्छाईयॉ नजर आने लगी है।
मिस्त्र में हाल ही में जनता ने हुस्नी मुबारक से उनकी गद्दी छीन ली और वहां सेना ने सत्ता संभाल ली । वहां भी जनता लोकतंत्र की चाह रखती है। मिस्त्र में हुए इस सत्ता परिवर्त्तन ने विश्व के कई अन्य देशों में भी लोकतंत्र की बहाली का संदेश दे ड़ाला है।
चीन जैसे देश में भी जनता में लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम करने की सुगबुगाहट शुरू हो गयी है। मोरक्को, बहरीन, यमन, युगांड़ा, लीबिया सहित विश्व के कई देशों में भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का समर्थन जनता द्वारा किया जा रहा है।








चाहे लोकतांत्रिक व्यवस्था जनता को उनका मौलिक अधिकार देकर भी कितनी ही अमौलिक और निरर्थक क्यों न हों चाहे उसके वास्तविक मूल्यों में कितना भी भटकाव क्यों न आ गया हो लेकिन आज भी लोकतंत्र विश्व पटल पर एक सुसंगठित, सुसंस्कृत और सुव्यवस्थित शासन व्यवस्था का सूचक है। ऐसे में जहाँ पहले से लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम है उन देशों का कर्तव्य बनता है कि वे अपने लोकतिंत्रक शासन व्यवस्था की मर्यादा को बचाने की भरपूर कोशिश करे। नहीं तो लोकतंत्र के अंदर से पनप रहा भ्रष्टाचार जब अपनी पराकाष्ठा पर पहूँच जायेगा तो जनता का विश्वास ऐसी शासन व्यवस्था से भी उठने लगेगा और जनता फिर लोकतांत्रिक व्यवस्था को भी बदलने और इसका विरोध करने का विचार बनाने लगेगी। या ये भी हो सकता है कि जनता यह कहने भी लगे की भागो वरना लोकतंत्र हमारे उपर थौंप दिया जायेगा।


............................................................(गंगेश कुमार ठाकुर)

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