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बुधवार, 30 मार्च 2011

क्रिकेट के बीच रिश्ते की तलाश








भारत और पाक के बीच मोहाली में खेले जाने वाले सेमीफाइनल मुकाबले के लिए भारतीय मीडिया ने पिछले सात दिनों में जो काम किया है वह काबिलेतारिफ है। हो भी क्यूँ नहीं मीडिया ने खेलधर्म को देश की प्रतिष्ठा के धर्म से जोड़ने का जो बहुमूल्य काम किया है।खैर इसमें केवल मीडिया की ही गलती नहीं है, गलती तो दोनों देशों के बीच के आपसी मतभेद का भी है। दोनों देश की जनता की मानसिकता का भी है जो मीडिया के इस महाप्रचार में शामिल हो गये हैं। मीडिया ने तो खैर इस महाप्रसाद को बेचकर अपनी जेब भरी लेकिन जनता का नुकसान हीं हुआ देश की इज्जत को दाव पर लगा सोचकर जनता पूरे खेल का वह आनंद नहीं उठा पायी जो आनंद खेल से प्राप्त किया जा सकता था। दोनों देशों का प्रतिनिधित्व कर रहे खिलाड़ी तो खेल भावना के साथ मैदान में उतरे थे लेकिन दोनों देशों की जनता के पैरों तले से जमीन पूरे खेल के दरम्यान खिसकती रही जब तक की खेल के आखिरी गेंद पर निर्णय नहीं आ गया।











वाह रे भारत और वाह रे भारतीय मीडिया “वसुधैव कुटुम्बकम्” के संदेश से दुनियाँ में अपनी पहचान बनाने वाला भारत, विश्व के मानचित्र पर विकास की धारा में सबसे तेज चलने वाला भारत आज के दिन अपने अहम में इतना मस्त था कि अपनी पहचान हीं भूल गया था।जी, हाँ बात कर रहा हूँ उसी भारत की जो विश्वगुरु के नाम से इस विशाल विश्वपटल पर जाना जाता है। जो आज भी विश्व की सबसे बड़ी और पुरानी सभ्यता-संस्कृति के लिए मशहूर है।भारत ने अपने गर्भ में इतिहास से लेकर वर्त्तमान तक की सभ्यता-संस्कृति के ना जाने कितने मोती छिपा रखे हैं। जहाँ के लोग दुश्मनों को भी गले लगाने के लिए जाने जाते हैं। क्षमादान की परंपरा की शुरूआत का श्रेय विश्व में जिस देश को जाता है वैसे देश में आज के इस पनपते दुश्मनी को देखें तो विस्मय की स्थिती पैदा हो जाती है और ऐसी दशा के लिए जिम्मेवार अधिकाधिक तौर पर मीडिया है और कोई नहीं।सैकड़ों भाषाओं, धर्मों, जातियों, समुदायों, संस्कृतियों और सभ्यताओं के बीच सामंजस्य स्थापित करके रखने वाला यह देश खेल में भी अपने पड़ोसी मुल्क से सौहार्दता नहीं रख पाता यह कैसे संभव है लेकिन अगर ऐसा हुआ है तो इसके लिए सबसे बड़ी जिम्मेवार दोनों देशों की मीडिया है ये सही है।दोनों देशों के इंसानों की मानसिकता में आया यह बदलाव सच में चिन्ता का विषय है कि विकास के इतने आयाम पा लेने के बाद भी दोनों देशों के लोगों की मानसिकता एक दूसरे के लिए और भी कुंठित होती जा रही है।













आज भारत में मूलत: दो हीं धर्म हैं एक सिनेमा और दूसरा क्रिकेट ऐसा मैं नहीं कहता मीडिया के आकलन में बार-बार कहा गया है य़ा लोगों ने खुद चिल्ला-चिल्ला कर कहा है।सुनकर अच्छा भी लगता है कि चलो विकास के इस दौर में जाति, धर्म, संप्रदाय वाली मानसिकता से उपर उठकर लोग सोच तो रहे हैं लेकिन ये क्या सारा गुड़ गोबर जब अपने पड़ोसी मुल्क से खेल के मैदान में मुकाबले की बात आते हीं वही कुंठित मानसिकता फिर से हमारे अंदर पनपने लगती है। वाह रे विकास, वाह रे समाज और वाह रे समाज की बदली मानसिकता।पाकिस्तान और भारत के बीच क्रिकेट विश्वकप का सेमीफाइनल मुकाबला जिस दिन से तय हुआ है मीडिया की तो मानो नींद गायब, चैन गायब एक हीं रंग हर चैनल पर हर जगह भारत-पाक मुकाबला मानो देश में कुछ और घट हीं नहीं रहा हो।इस बात को आमजन के जैहन तक पहूँचाने के लिए मीड़िया ने जिन शब्दों और भाषाओं का प्रयोग किया है ऐसा लगने लगा था भारत और पाक के बीच फिर से कारगिल युद्ध की शुरूआत होने वाली है और मीडिया जनता को इस भीषण महासंग्राम से रूबरू करा रही है। हाय रे मीडिया और वाह रे इनकी जिम्मेवारी क्या कमाल का काम किया था।दूसरी तरफ देश के प्रमुख पाक प्रमुखों को मैच देखने आने का न्योता भेजने में लगे थे पाक प्रमुखों ने निमंत्रण स्वीकार भी की और वे इस क्रिकेट के जरिये इस भारत पाक युद्ध के गवाह भी बने ये शब्द भी मेरे नहीं हैं बल्कि हमारी मीडिया के हीं हैं। भाई ये खेल का मुकाबला क्या हुआ मीडिया ने इसके लिए खेल को छोड़कर युद्ध, महायुद्ध, महासमर, ज़ंग, महासंग्राम, दुश्मनी का बदला, आर-पार की लड़ाई, महाजंग जैसे दोनों देशों के बीच से कुछ समय से खोये और सोये शब्दों को फिर से हल्लाबोल की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। एक चैनल ने तो तब हद कर दी जब इस मुकाबले पर अपने एक खास कार्यक्रम का शीर्षक चैनल ने दिया था भारत-पाक चौथा युद्ध।











भारत और पाक के बीच इस मैच को देखने आ रहे पाक और भारतीय प्रमुखों के मिलने से दोनों देशों के बीच रिश्ते मजबुत होंगे यह भी मीडिया का ही कहना था ऐसे में मीडिया का यह दो तरह का चेहरा आम लोगों के समझ से परे था। लेकिन हमारे राजनयिकों ने भी कहा कि इससे दोनो देशों के बीच रिश्तों में एक नयापन आयेगा अगर दोनों देशों के बीच इस खेल के जरिये रिश्ते बेहतर हो सकते हैं तो फिर दोनों देशों को थोड़े-थोड़े अंतराल के बाद मैच खेलते रहना चाहिए था। आज तक तो दोनों देशों के बीच रिश्ते काफी मजबुत हो चुके होते।
ऐसे में आम जनता और मीडिया ने जो माहौल बना ड़ाला उससे खेल के अन्दर की खेल भावना का सम्मान बिल्कुल खत्म हो गया, उपर से मीडिया ने इस मुकाबले को ऐसे-ऐसे शब्दों से नवाजा कि भारत में धर्म के रूप में पूजे जाने वाले इस खेल की हार हो गई।भारत और पाक के खिलाड़ियों ने अपनी तरफ से पूरी तरह से खेल भावना का परिचय दिया दोनों के बीच काँटे की टक्कर रही भारत का पलड़ा भारी रहा और उसने पाकिस्तान से यह मैच जीतकर फाइनल में अपनी जगह बना ली।
इस मुकाबले के पहले दोनों देशों के कुछ आवारा वतनपरस्त लोग अपने–अपने देश की जीत की बात तक करते रहे और ये भी कह दिया कि अगर हमारा देश जीत गया और हम फाइनल हार भी गये फिर भी हम विश्वविजेता देश कहलायेंगे। ऐसी घटिया वतनपरस्ती का भी शिकार होता रहा यह भारत पाक मुकाबला। ये बात नई नहीं है कि ये बातें हो रही थीं हाँ ये जरूर नया है कि इतने सालों के बाद भी दोनों देशों को एक दूसरे के प्रति सोच में कोई बदलाव नहीं आया है।ऐसे में दोनों देशों की मीडिया, राजनेताओं, बुद्धिजीवी वर्ग के लोगों के साथ-साथ दोनों देश के समाज के हर खासो-आम लोगों को यह कोशिश करनी पड़ेगी की वे एक दूसरे की भावनाओं, उनकी सोच का ख्याल रखें उनके बारे में अपने अंदर अच्छी राय कायम करें और एक दूसरे का सम्मान करने और सम्मान बचाने की चेष्टा करें तभी दोनों देशों के बीच संबंध मधुर होगों वरना 65 वर्षों से बिगड़े रिश्ते एक-आध मैचों से नहीं सुलझते ।


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