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शनिवार, 30 अप्रैल 2011

गरीब का बच्चा हूँ







तिनकों से जोड़ी झोपड़ी के,
बाहर एक हाड़ माँस के लोथड़े से,
बस निर्माण की गई,
प्रकृति की वह अनुपम छवि,
दिख गयी थी,
पता चल रहा था कि इनपर,
वही देवी मेहरबान है,
जिसका नाम गरीबी है,
आधे ढ़के तन से,
शरीर के कई अंग,
यूँ झलक दिखला रहे थे,
मानो पश्चिम की देवियों की तरह,
इन्हें भी कपड़ों से प्रेम न रहा हो,









लेकिन क्या करे,
गरीबी की देवी ने,
पश्चिम की देवी का यह लिवास,
इस हाड़ माँस वाली काया को,
श्राप स्वरूप सौंपा था,
उस अधनंगे तन में भी,
उस तिनके की झोपड़ी के चौखट पर,
वह अपने दुधमुहे बच्चे को,
अपनी छाती से लगाये,
बेशर्म होकर बेपर्दे में हीं लेकिन,
वह उस दुधमुहे को अपना,
दुध पीला रही थी,
सामने वहीं पास में जमीन पर,
एक और हड्डियों का ढाँचा,
मानो भगवान ने हड्डियों पर,
केवल चमड़े की तह चढ़ा रखी हो,
पेट यूँ निकला हुआ,
मानो पाषाण,
उसे सौगात में मिली हो,













एक कटोरे में,
चंद भात के दाने,
के साथ चिपटती दाल को,
खुद अपने कमजोर हाथों से,
उठाकर मुँह तक लाता था,
चावल के चंद दाने,
उसके मुँह में जाते,
और ज्यादा दाने,
जमीन को भेंट चढ़ जाते थे,
उसके कटोरे में,
उसके शार्गिद,
कोई और भी था,
भिनभिनाती मक्खियाँ,
उसके नाक से बहने वाली धारा,
जो निरंतर,
उसके भात दाल से मिलकर,
उसके पेट का रास्ता,
तय कर रही थीं,









लेकिन फिर भी,
वह बड़े मजे में,
उसी तरह भात के दानों को,
कटोरे से फिर उठाता,
और मुँह में ड़ालता,
शायद वह मन हीं मन,
खुश होकर,
गुनगुना रहा था,
कि मुझे क्या,
मैं तो जग में,
सबसे अच्छा हूँ,
जो मिलता है रूखा-सूखा,
उसी में जिन्दा रहने की
कोशिश करता हूँ,
क्योंकि मैं तो,
एक गरीब का बच्चा हूँ।



------------------------------------------(गंगेश कुमार ठाकुर)


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