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शनिवार, 20 अगस्त 2011

वंशवाद और मतभेदों के बीच कांग्रेस का ढहता किला



आज़ादी के बाद जब से भारत में लोकतंत्र की स्थापना हुई है भारत की राजनीति में कांग्रेस पार्टी का दबदबा बना हुआ है। आज़ादी को मिले इतना वक्त गुज़र गया लेकिन बहुत कम ऐसा समय रहा होगा जब हिन्दुस्तान की सत्ता पर कांग्रेस का राज न हो। इससे भी खास बात यह है कि कांग्रेस के इतने लंबे शासन काल में एक हीं परिवार का इस पार्टी के अंदर दबदबा बना रहा, वह है नेहरू-गांधी परिवार, अब तक कांग्रेस के शासन काल में अधिकाधिक समय तक इसी परिवार का व्यक्ति प्रधानमंत्री पद पर विराजमान होते आ रहे हैं या पार्टी में इस परिवार को खास जगह मिलती रही है। गौर करने वाली बात यह है कि सत्ता कांग्रेस पार्टी के हाथ में हो और प्रधानमंत्री पद पर कोई भी आसीन क्यों न हो पार्टी के सारे फैसले लेने का अधिकार नेहरू-गांधी परिवार के पास हीं होता है। कांग्रेस पार्टी के लिए यह परिवार उनका पहचान चिन्ह बन गया है।
ऐसे में यूपीए-2 की सरकार में तात्कालिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का बयान आता है कि राहुल जिस दिन चाहेंगे, प्रधानमंत्री बन सकते हैं। वे बिना किसी रोक- टोक के उनके लिए अपनी कुर्सी खाली कर देंगे। प्रधानमंत्री के इस बयान ने तो सारे देश को एक अनावश्यक बहस में उलझा कर रख दिया कि क्या अब सचमुच राहुल गांधी सत्ता संभालने के योग्य हो गये हैं या बात कुछ और ही है। खैर यह पार्टी का अंदरूनी मामला है कि वह सरकार चलाने के लिए किस को जिम्मेदारी सौंपना चाहती है।लेकिन, ईमानदारी से कहा जाऐ तो यह फैसला कांग्रेस पार्टी को कम और राहुल एवं सोनिया गांधी को ज्यादा करना है। इससे पहले 2004 में पार्टी ने जीत के साथ सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री बनने की घोषणा कर दी थी, लेकिन सोनिया गांधी ने डॉ मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाकर देश और दुनिया को अचरज में ड़ाल दिया था।









कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता दिग्विजय सिंह ने तो यह तक कह दिया कि अब वो राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बने देखना चाहते हैं। बात जब ज्यादा तूल पकड़ने लगी तो उन्होंने स्पष्टीकरण देते हुए यह कहा कि उनके इस बयान का मतलब सिर्फ इतना था कि वो अपने जीवन काल में राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बने देखना चाहते हैं। इतना हीं नहीं, राहुल गांधी भी प्रधानमंत्री पद पर आसीन होने के लिए जनता और मीडिया की नज़रों में बराबर बने रहने की हर संभव कोशिश में लगे हुए हैं, इसके लिए कभी राहुल यूपी के गांवों में किसानों के बीच जाते हैं, तो कभी राहुल ग्रेटर-नोएडा से अलीगढ़ तक की पैदल यात्रा करने का लक्ष्य लेकर गांव-गांव फिरते और किसानों की सभाओं को संबोधित करते नज़र आते हैं।
ऐसे में भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में बार-बार सामंती तरीके से जनता को यह सूचित करना कि अब कौन व्यक्ति राजकाज संभालने के योग्य हो गया है, प्रधानमंत्री पद के होने वाले सर्वमान्य चयन प्रक्रिया की अवमानना नहीं है तो और क्या है ? लेकिन सबसे बड़ी बात तो यह है कि भारतीय राजनीति का चेहरा बिल्कुल बदल चुका है। अब किसी एक व्यक्ति को धुरी बनाकर या जनता के सामने रखकर वोट नहीं बटोरे जा सकते। राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद देने का जितना ज्यादा ढ़िंढोरा कांग्रेस पीट रही है कहीं ऐसा न हो कि जनता से राहुल की दूरी उतनी हीं बढ़ती चली जाए और इसका नुकसान सरकार को उठाना पड़े।
डॉ सिंह एक जिम्मेदार, विनम्र, मृदुभाषी, विश्वास से भरे प्रधानमंत्री हैं इसमें शक की कोई गुंजाईश नहीं है। अगर राहुल के पक्ष में कांग्रेस ऐसे ही गैर-जरूरी प्रचार की कोशिश करती रही तो जनता की साहनुभूती डॉ सिंह के लिए और ज्यादा बढ़ जाऐगी। तमाम भ्रष्टाचार के मकड़जाल में फंसी यूपीए-2 सरकार का ग्राफ 2004 की अपेक्षा 2011 में नीचे ही गिरता जा रहा है । सरकार के पास अपनी साख बचाने के लिए दो वर्ष से कुछ ज्यादा का समय बच पाया है। अगले लोकसभा चुनाव तक कांग्रेस की स्थिति में सुधार की गुंजाईश भी कम ही दिख रही है| ऐसे में राहुल गांधी को अगर प्रधानमंत्री पद पर आसीन होना है तो पहले यूपीए गठबंधन सरकार के तमाम हालातों पर गौर करके एक सुलभ-सुगम सरकार का गठन कराना होगा | इस छोटे से बचे कार्यकाल में पार्टी को अपनी छवि में सुधार लाने पर बल देने की आवश्यकता होगी | साथ ही साथ पार्टी को राहुल गांधी के पक्ष में किये जा रहे सामंती घोषणा से भी बचना होगा | राहुल गांधी को अगले चुनाव तक अपनी वर्तमान भूमिका का निर्वाह ही पार्टी में रहकर करना उचित होगा, या तो मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार के मंत्रीमंडल में तत्काल शामिल होकर सरकार चलाने का अभ्यास करना राहुल गांधी को शुरू कर देना ही चाहिए |
कांग्रेस पार्टी अगर अगले प्रधानमंत्री के रूप में राहुल गांधी को देखना चाहती है तो कांग्रेस के प्रवक्ताऔं को डॉ मनमोहन सिंह को कमजोर बताने वाले बयानबाजी से निकलकर बाहर आने की जरूरत होगी | सोनिया गांधी को भी जनता को यह दिखाना होगा कि कांग्रेस पार्टी के अंदर वास्तविक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की छवि का दबदबा कायम है न कि काल्पनिक प्रधानमंत्री की छवि का | लेकिन हालात यह है कि डॉ मनमोहन सिंह खुद भी यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि उन्हें भारत की जनता द्वारा निर्वाचित किया गया है या सोनिया गांधी द्वारा |
एक प्रधानमंत्री के होते हुए सार्वजनिक तौर पर सामंती तरीके से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा लोकतंत्र में कहाँ तक जायज़ है यह जनता अच्छी तरह से समझती है | ऐसे में सवाल यह उठता है कि प्रधानमंत्री देश के प्रति जिम्मेदार हैं या कांग्रेस पार्टी और नेहरू-गांधी परिवार के प्रति ? क्या प्रधानमंत्री पद की गरिमा को ऐसे बयानों से ठेस नहीं पहुँचती ? क्या कांग्रेस पार्टी पूरी तरह से नेहरू-गांधी परिवार के प्रति समर्पित है ? क्या कांग्रेस पार्टी के पास मनमोहन सिंह के अलावा कोई और दूसरा विकल्प नहीं है ? क्या, राहुल गांधी के अंदर प्रधानमंत्री पद के लिए वो सभी योग्यताऐं हैं जो पार्टी के किसी वरिष्ठ नेता में नहीं है ? क्या कांग्रेस केवल परिवारवाद की राजनीति करती है ? तमाम ऐसे सवाल कांग्रेस पार्टी और उनके प्रवक्ताओं के बयानों को लेकर भारत की जनता के मन में पनपने लगे हैं | लेकिन पार्टी को उन तमाम सवालों से कोई मतलब नहीं है | सरकार अपने गठबंधन के दूसरे कार्यकाल में कुछ खास नहीं कर पाई है, सरकार की साख अधर में लटक रही है। लेकिन पार्टी राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनते देखने का सपना आँखों में पाले बैठी है | देश को बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, भूख, गरीबी काल की तरह निगल रही है, सरकार लोकपाल के मुद्दे पर जनता की अदालत के कटघरे में खड़ी है | सरकार के द्वारा यूपीए-2 के चुनावी वादे और कई अन्य परियोजनाऐं अधर में लटकी हुई है, पार्टी को इन मुद्दों से कोई मतलब नहीं है| उन्हें तो प्रधानमंत्री के रूप में सिर्फ राहुल चाहिए | प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपने विरोधियों से जितना परेशान नहीं उससे ज्याद वो अपनी पार्टी के सदस्यों से परेशान हैं, जो यह चाहते हैं कि मनमोहन सिंह को कमज़ोर किया जाए और राहुल गांधी को आगे लाया जाए | यूपीए-1 की सरकार में मनमोहन सिंह के चेहरे पर जीत की जो मुस्कान थी यूपीए-2 की सरकार में आते-आते वह भी गायब हो चुकी है |












अब अगर बात दिग्विजय सिंह के बयान कि की जाए तो स्पष्ट तौर पर यह कहा जा सकता है कि सिंह के रिश्ते सोनिया और राहुल से बहुत अच्छे हैं, जब वो बोलते हैं तो उनके सहयोगी उसे ‘परिवार’ की आवाज़ मानते हैं | ऐसे में नेहरू-गांधी परिवार का राहुल गांधी को सत्ता पर आसीन कराने की मंशा साफ झलक रही है | प्रधानमंत्री डॉ सिंह सरकार में एक मुखौटा बनकर रह गये हैं | सत्ता का संचालन पूरी तरह से सोनिया-राहुल के हाथ में है | ऐसे में प्रधानमंत्री को जितनी चाबी भरी जाती है वो उतना हीं चल पाने में सक्षम हैं | मज़बूत नेता के अभाव में मंत्रिमंडल में अनुशासन समाप्त हो चुका है, कैबिनट में फेरबदल तक के फैसले में प्रधानमंत्री की राय को सबसे कम तरजीह दी जाती है |









हालांकि, राहुल ने जब 2007 में पार्टी में अपना कार्यभार संभाला था तब कांग्रेस की युवा इकाई से परिवारवाद, संरक्षणवाद और धनबल की राजनीति समाप्त करने का अपना सपना सबों के सामने रखा था, लेकिन चार साल के इस सफर में राहुल ने कांग्रेस पार्टी की युवा इकाई में जितने उम्मीदवारों का चयन किया वो तमाम चेहरे कहीं-न-कहीं कांग्रेस पार्टी के नेताओं के रिश्तेदार या उनके संरक्षण में पलने वाले या धन के बल पर राजनीति में अपनी पैठ रखने वाले हैं | ऐसे में जब राहुल गांधी खुद इस वंशवाद, सरंक्षणवाद और धनबल की परंपरा को रोकने में नाकाम रहे हैं तो कांग्रेस पार्टी से यह उम्मीद कर पाना की वह वंशवाद की परंपरा से उबर पाऐगी एक कोरी कल्पना लगती है| ऐसे में देश के पास मनमोहन सिंह के लिए अफसोस जताने का भी वक्त नहीं है, क्योंकि खुद मनमोहन जिस कुर्सी पर बैठे हैं वह उनकी अपनी नहीं किसी परिवार की अमानत है| जिसका राजकुमार अब राजकाज में प्रवीण हो गया है और उसके राजतिलक के लिए उसका पूरा मंत्रीमंडल अब हल्के स्वर से आवाज़ उठाने लगा है | ऐसे में वर्तमान प्रधानमंत्री अपना जायज़ अधिकार भी नहीं जता पाते | क्योंकि उनकी आवाज़ के पीछे से एक परिवार की आवाज़ आती है जो स्वतंत्रता के बाद से आजतक कांग्रेस पार्टी का नेतृत्व करती आयी है और सत्ता का पूरा सुख उनके ही हिस्से रहा है | ऐसे में बस इतना हीं कहा जा सकता है ‘जय हो परिवारवाद के राजनीति की’ , ‘जय हो गमुसुम मनमोहन सिंह जी की’, ‘जय हो कांग्रेस पार्टी की’ और ‘जय हो भारतीय लोकतंत्र की’ |


(गंगेश कुमार ठाकुर)




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