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शनिवार, 24 मार्च 2012

एहसास





अजनबी सी थी वो
ख़्यालों में आती रहती थी
वो हसीन थी पर पर्दा नशीं थी
कल हकीकत में सामने आयी
खु़दा की कसम मैं घबरा गया
वो रोज-रोज सोचना उसके बारे में
क्या पता ?
कब मुझे दिवाना बना गया
अब सोचता हूं ये दिवानापन है
या है जादू उसकी नजरों का
जाम छलका भी नहीं आंखों से
पूरा मैखान बहक गया






वहां अब कोई कहां
पैमाने की फ़िक्र करता है
उसकी शोख नज़रें हीं तो
जाम का पैमाना बन गया
शराबोर हो चुका था मैखाना
उसके बेपर्दा हो जाने के ख़्यालों में
वो हकीकत में होती
तो कयामत ही मुमकिन थी
अच्छा हुआ की दिन चढ़े
दीदार किया है मैंने
बेपर्दा उस पर्दा नशीं का
ख़ुदा की कसम
वरना उस रात
कदम मेरे भी बहक जाते ।

1 टिप्पणी:

  1. बहक रहे हैं आप भी सर..
    कविता ने प्रवाह को अपने आगोश में समय हुआ है
    सुन्दर प्रयास.

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