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शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

आप बताएं आप मजबूर हैं या मजबूत?

मजबूत और मजबूर लोगों को समझने में देश की जनता को भारी मुसीबत का सामना करना पड़ता है। देश के हालात कुछ ऐसे हैं कि समझ नहीं आता कि यहां कौन मजबूत और कौन मजबूर है। मजबूत और मजबूर के बीच का फर्क तो उन्हें ही पता चल पाता है, जो चक्की के इन दोनों पाटों के बीच पिसते हैं। सरकार मजबूत थी तो देश मजबूर था, इसिलए सरकार की मनमानी सहनी पड़ती थी। विपक्ष मजबूर था, इसलिए पक्ष की बातों को काटना उसके लिए संभव नहीं था। एक वक्त ऐसा आया जब सरकार भी मजबूर हो गयी, लेकिन देष को कोई फर्क नहीं पड़ा, वह मजबूर का मजबूर बना रहा। जिसके मद्देनजर लाचारी, गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, अशिक्षा ने अपना पांव पूरी तरह जमा लिया। विपक्ष तब भी मजबूर रहा, क्योंकि सरकार की तरह विपक्ष भी समझौते की बैसाखी लेकर चल रहा था। जब देश में स्वतंत्रता के बाद सरकार बनी तब विपक्ष मजबूत नहीं था तब देश की जनता को सरकार के कार्यक्रमों के तहत अपनी जिंदगी का ताना-बाना बुनना पड़ता था। गुलामी में जी रही आजाद ख्याली के सहारे देश की जनता अपना जीवन जीने पर मजबूर थी। लेकिन जब आजादी मिली तो उन्हें लगने लगा था मानो आजादी के रूप में उन्हें संजीवनी मिल गयी हो। उन्हें क्या पता था कि गोरे से ज्यादा देश के लिए जहरीले काले-कोबरे होंगे। जैसे-तैसे देश की सरकार देश की सत्ता चलती रही और रोज नए सपने के साथ भारत निर्माण की पहल का छलावा पहले तो जनता को सुनहरा लगा, लेकिन धीरे-धीरे वह छलावे भरा झूठ परत-दर-परत खुलने लगा। स्वतंत्र भारत की सरकारी कुर्सी पर बैठे हुक्मरानों का चोला बदलने लगा। खाने में जहर हो या जहर में खाना दोनों ही जीवन के लिए खतरनाक है। एक में कष्ट थोड़ा कम और एक में थोड़ा ज्यादा। खैर देश के हालात में परिवर्तन की बयार स्पष्ट बहती दिखने लगी और सत्ता का स्वरूप बदल गया। एकल आधिपत्य के बाद सत्ता में बहुत सारे लोगों का हस्तक्षेप दिखने लगा। सत्ता की लोलुपता ने देश की जनता को सरकार की सोच से यूं बाहर निकाल फेंका जैसे दूध में से मक्खी।

सरकार जनता को विकास के नाम पर कल-कारखाने, बड़ी-बड़ी इमारतें, चोड़ी सड़कें और न जाने क्या-क्या लाकर देने के कोरे सपने दिखाती रही और अंततः काम वाले हाथों से काम छिन गया, मेहनत की कीमत निर्धारित कर दी गई, सत्ता के विपक्ष में लिखने या बोलने वाले स्वतंत्र मीडिया को स्वतंत्र तो रहने दिया गया, लेकिन कुछ अरसे बाद उसे भी उद्योग का दर्जा मिल गया। लोग भ्रष्टाचार के खिलाफ सड़कों पर उतरे तो उन्हें तितर-बितर करने और रौंदने की कभी तो कामयाब और कभी नाकामयाब कोशिश की गई। जनता का गुस्सा हवा के रुख के साथ बनता बिगड़ता रहता है, इस बात का एहसास देश की सरकार को हमेशा से रहा है, सो हवा के रुख के बदलने के साथ देश की सरकार ने अपने बयानों में अपनी कथनी-करनी दोनों में फर्क करना शुरू कर दिया। खैर जनता समझे ना समझे इससे पहले लक्ष्मी के रखवाले और लक्ष्मी को जनता के पास भेजने वाले ने देश की जनता को यह कहकर महान बना दिया की 15 रुपए और 23 रुपए की रकम हर रोज खर्च करने वाले पर तो लक्ष्मी मेहरबान है ही, ऐसे में वो गरीब नहीं हैं। फिर ये कहकर भी लोगों को लताड़ा की 15 रुपए की आइस्क्रीम तो खा लोगे, लेकिन एक रुपए किलो चावल या गेहूं महंगी हो जाए तो चिल्लाने लगोगे। आखिर लक्ष्मी तुम्हारे ऊपर मेहरबान है तो फिर तुम लोग उसकी इज्जत क्यूं नहीं करते? उनके जयकारे लगाने की जगह बात-बात पर चिल्लाते क्यूं रहते हो? अब इतना कुछ हो गया तो भी फर्क कहां से समझ में आता। देश में युवाओं को उद्योग प्रबंधन की शिक्षा जो दी जा रही थी, ताकि जनता को ये युवा समझा सकें कि देश को बाजार कैसे बनाना है और सरकार के परजीवी और परपोषी को कैसे जनता की नजरों में सम्मान दिलाना है। बची लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की बात तो सरकार के नुमाइंदो को पता था जनता को जगाने का हौसला इन्हीं लोगों के पास है। सरकार को इससे बड़ा खतरा नजर आया तो सरकार ने इनकी स्वतंत्रता पर भी बाजार का पहरा लगा दिया। जब किसी पर भी बाजार का पहरा लगता है तो फिर वो चीजें केवल मुनाफे के लिए बिकती हैं। अब चौथा स्तंभ भी बाजार भाव निर्धारण कार्यक्रम का पक्षधर हो गया। इस स्तंभ की भी बोली लगने लगी और फिर शुरू हुई सरकार की लोमड़ी वाली शातिर चाल जनता फिर हवा के रुख की तरह बदलती चली गई। इसके साथ भी जनता ने जीना सीख लिया। अब मीडिया के ऐसे रवैये में मजबूत लोग कम और मजबूर लोग ज्यादा अपनी रोटी सेंकने लगे। कालाधन बचाना हो, कर बचाना हो या ऐसी कई चीजों के लिए भलेमानस लोग इस उद्योग का सहारा लेने लगे। ऐसे में यह स्पष्ट हो गया की देश मजबूत लोगों से नहीं मजबूर लोगों से चलता है। लेकिन यह भी स्पष्ट हो गया की केवल देश ही नहीं देश का हर धंधा मजबूरी में ही चलता है, चाहे वह सरकार चलाना ही क्यूं न हो। आप अगर मजबूर हैं तो आप उद्योग के मालिक हैं। आप अगर मजबूत हैं तो आप मजबूर के घर काम करने वाले नौकर.... वाह रे देश की मजबूरी।

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