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मंगलवार, 11 दिसंबर 2012

अनदेखी


अनदेखी, अनसुलझी, अनचाही, अनोखी
कहानी का एक छोटा सा हिस्सा
बेवजह ही परेशान करता है
दिल को, दिमाग को, मन को
यह जानकर भी की
यहां मेरी स्वप्नपरी बसती है
जलते-बुझते प्रकाश स्तंभ
धुँधली पड़ती स्वप्न छाया
कई अधूरी तस्वीरों को
यूं ही अधूरा छोड़कर
लौट आती है मेरी तरफ
मेरे अतीत पर चोट
मेरे संवेदनाओं पर प्रहार करती है
जब मेरे अंदर से
उठती है तेज सिसकियाँ
तो बदल लेती है
अपना रास्ता खुद
फिर मुझे छोड़ जाती है
बिल्कुल अकेला
उन सिसकियों के साथ
यादों का बबंडर
हो जाता है तेज और तेज
मैं उनमें ढूंढने लगता हूं
फिर वही तस्वीर
जो शायद बदल दे
मेरी तकदीर
फिर वही दोहराव का भय
सिसकियों के ख्याल मात्र से
पीछे मोड़ लेता हूं
अपने कदम को
फिर समेटने लगता हूं
अपने अतीत के बिखरे पन्ने
जिसपर नया जैसा कुछ भी नहीं
है तो बस काली स्याह रात
और दर्द केवल दर्द
इसके सिवा कुछ भी नहीं।


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