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गुरुवार, 13 दिसंबर 2012

आखिर सरकार क्यों नहीं समझती?


बात एफडीआई के मुद्दे पर हो या किसानों के आंदोलन पर, बात रसोई गैस पर सब्सिडी खत्म करने की हो या गरीब तबके के लोगों तक रुपया पहुंचाने पर। आखिर इन सब बातों में एक बात समान है। हर जगह आखिर सरकार को विपक्ष की नाराजगी और गुस्से का सामना क्यूं करना पड़ता है। कभी आम जनता ने ये सोचने की कोशिश नहीं की । कारण स्पष्ट है कि पांच साल में एक बार मतदान कर हम अपनी जिम्मेदारी के बोझ से मुक्ति पाना चाहते हैं। आगे हमारी बनाई हुई सरकार लोकतांत्रिक व्यवस्था के नाम पर हमारे ऊपर जितना चाहे उतना बोझ क्यूं ना डाले। आम जनता धोबी के गदहे की तरह है जिन्हें अपने ऊपर लदे बोझ से ज्यादा मालिक के हुक्म को सुनने और मानने की आदत पड़ गई है। सरकार को देश की आम जनता की जितनी चिंता है उससे कहीं ज्यादा चिंता कॉर्पोरेट घरानों की है जहां के पैसे से सरकार बनती और चलती है। कृषि प्रधान देश में अब खेती के साधनों और उपज पर भी कॉर्पोरेटरों का अधिकार है या यूं कहें की अब जमीदारों की जगह कॉर्पोरेटरों ने ले ली है। छोटे किसान या पूरातन कृषि व्यवस्था नाम मात्र की होकर रह गई है। रोजगार की संभावनाऐं बड़े शहरों तक सिमटती चली जा रही है। नाम के लिए हो रहा विकास हमारी संस्कृति के कई धरोहरों को चौपट करता चला जा रहा है। संयुक्त परिवार की प्रथा समाप्त हो चुकी है। जिसका एक मूल कारण गरीबी, बेरोजगारी और अशिक्षा है। लुभावने आंकड़ों के भंवरजाल में फंसे लोग बड़े शहरों के आस-पास बिछी सड़कों, तेज चमचमाती रोशनी के चकाचौंध और बहुमंजिला इमारतों को विकास का नाम दे रहे हैं। पिछले दस साल का ही आंकड़ा उठाकर देखें तो पता चल जाएगा कि आखिर हम इन चमचमाती रोशनी के मध्य भी कितने अंधेरे में डूबे हुए हैं। भारत के हर व्यक्ति पर विश्व बैंक का करोड़ों का कर्ज है। ऐसे में कर्ज लेकर चमचमाती रोशनी का विकास पथ कितना सुगम होगा यह हम खुद ही सोच सकते हैं। देश की जनसंख्या लगभग 130 करोड़ को पार कर चुकी है। देश में कृषि योग्य भूमि कम होती जा रही है। सरकार के पास जनता को लुभावने के नित नये तरीके खोजने के लिए सक्रिय अधिकारियों की एक फौज है। जो सरकार के एजेंडे में रोज एक नया विकास मॉडल जोड़ते रहते हैं। पर स्थिति वही ढाक के तीन पात। जनता को इसका फायदा ही नहीं मिलता बल्कि फायदा मिलता है तो सिर्फ कॉर्पोरेटरों को, विकास का मॉडल तैयार करने वाले को या फिर उस मॉडल को लागू करने वाले को। सरकार ने बीपीएल और गरीब तबके के लोगों के लिए खाने पीने की चीजों को दी जानेवाली सब्सिडी को खत्म करने की घोषणा यह कहकर कर दी की अब उन गरीबों के खाते में हर साल तीस हजार रुपये जमा करा दिए जाएंगे । सरकार ने कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि इनमें से कितने ऐसे गरीब परिवार हैं जिनके पास बैंक खाते हैं? या उनके शहर या गांव के नजदीक या गांव में बैंक की सुविधा है भी या नहीं? या इनमें से कितने ऐसे परिवार हैं जिनके पास बैंक खाते के संचालन की पर्याप्त जानकारी है? सरकार ने तो सिर्फ विकास का एक मॉडल तैयार किया और आनन-फानन में उसे लागू करने पर आमादा हो गई। सरकार ने कभी ये नहीं सोचा की इन पैसों का सदुपयोग होगा या दुरुपयोग। सरकार ने देश की जनता के हाथों में मोबाईल फोन थमाने का निर्णय लिया था तो विकास की दिशा में हमने एक अदभूत कदम रखा था लेकिन जल्द ही सरकार की मंशा सबकी समझ में आ गई जब 2जी और 3जी स्पेक्ट्रम जैसे राक्षस के साक्षात दर्शन हुए। देश आज जितना विश्व बैंक के कर्जे में डूबा है उससे ज्यादा धन का तो घोटाला देश में सामने आ चुका है। इससे स्पष्ट हो गया है कि सरकार देश की जनता के लिए कर्ज नहीं लेती वह तो केवल दिखावा मात्र है । कर्ज लेकर कंबल की आड़ में घी कोई और ही पी रहा है। आज एफडीआई के नाम से देश की जनता हिली हुई है लोगों को इस नरपिशाच के आने से अपना नुकसान होता नजर आ रहा है पर सरकार के पास तो जनता के लिए रोजगार से लेकर मंहगाई से उबारने तक के कई लुभावने सपने हैं। जिनसे सरकार जनता को धोखा दे रही है। ऐसा नहीं है की एफडीआई से देश को केवल नुकसान ही होगा लेकिन जितना नुकसान देश को होगा उसके मुकाबले फायदा नाममात्र का होगा। श्रमशक्ति का दोहन, जमीन का दोहन, मुद्रा का दोहन, बाजार का दोहन और न जाने ऐसे कितने ही चीजों का दोहन होता चला जाएगा। जनता फिर चकाचौंध के बीच अंधेरे में खड़ी बगले झांकती रहेगी। 1990 में देश के तत्कालीन वित्तमंत्री मनमोहन सिंह ने देश में विदेशों से सीधे पूँजी निवेश का जो तोहफा दिया था आज उसका जितना फायदा दिख रहा है उससे ज्यादा नुकसान देखने को मिल रहा है। श्रम की कीमत घटती चली जा रही है और मंहगाई का दानव मुंह फैलाए खड़ा है। आखिर ऐसे मुद्दों पर जब सरकार को विपक्ष के विरोध का सामना करना पड़ता है तो वह बिना जनता के हित को ध्यान में रखे सिंह गर्जना क्यूं करने लगती है। ऐसा नहीं की सरकार के नुमाइंदों को इन विकास मॉडलों की खामियों के बारे में पता नहीं है। लेकिन मॉडल के लागू होने और उससे पनपे भ्रष्टाचार के प्रभावी हो जाने तक ये नुमाइंदे चुप रहते हैं और फिर जब जनता जवाब मांगती है तो ये अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश में लग जाते हैं। सरकार की इन दोहरी नीतियों का असर न तो कॉर्पोरेटरों पर पड़ता है न अफसरों पर न ही सरकार के नुमाइंदों पर इसका सीधा असर पड़ता है देश की आम गरीब भोली-भाली और मासूम जनता पर जिनके सर सरकार के विकास मॉडल की पगड़ी बाँधी जाती है। एसे में जनता की चुनी हुई सरकार जनता के दु:ख और गम क्यों नहीं समझती और जनता के फायदे का विकास मॉडल क्यों नहीं तैयार करती। इसका स्पष्ट सा मतलब है लोकतांत्रिक सरकार तो जनता का, जनता के द्वारा, जनता के लिए बनाई गई सरकार है लेकिन उसमें जनता की खुशी का कोई भी मतलब शामिल नहीं है। संसद में बैठी सरकार को ये समझने की जरूरत है कि जिस दिन जनता उससे इस काम का हिसाब मांगेगी उस दिन सरकार क्या इसका जवाब दे पाएगी?        

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