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गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

कुछ भी तो अलग नहीं है ।


                                 

बर्षा की बूंदों को
शब्दों की तरह गिरते देखा है
पत्तियों की तरह झड़ते देखा है
रूकते देखा है, चलते देखा है
गिरते और संभलते देखा है
डूबते देखा है, निकलते देखा है
यथार्थ बनते और शब्द बुनते देखा है
महसूस किया है
कभी बड़ी-बड़ी बूंदें
मानो शब्दों का भारी प्रवाह
कभी छोटी-छोटी हल्की बूंदें
मानो हल्की-फुल्की नोक-झोक
कभी केवल रिमझिम फुहार
मानो शीतल सुंदर शब्दों की मधुर धारा
कितनी समानता है ना
शब्दों में और वर्षा की बूंदों में
दोनों में भरे हुए हैं
करुणा, प्यार, क्रोध, शीतलता और खुशी
जैसे न जाने कितने ही भाव
बारिश की बूंदों में से
उठते स्वर को सुनकर
समझकर जाना है मैंने
एक अनजान सी कहानी होती है
एक शब्द, एक स्वर, एक धुन
एक ताल, एक लय, एक छंद
एक संगीत, एक अर्थ, एक भाव होता हैं इसमें
कुछ भी निरर्थक नहीं होता
अलगाव का दु:ख, बिखराव का ग़म
समर्पण की खुशी, मिलन का आनंद
सब कुछ अपने अंदर समेटे रहती है
बारिश की हर बूंद
बिल्कुल शब्दों की तरह
कुछ भी तो अलग नहीं होता
शब्दों में और बर्षा की बूंदों में।



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