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मंगलवार, 15 जनवरी 2013

नहीं होती महानगर में रात


महानगर की सड़कों पर
रात को बेखौफ जलती बत्तियां
दूधिया, लाल, पीली
न जाने और कैसी-कैसी
अनगिनत असंख्य पिंडों की तरह
जो धरती पर उतर आई हो
मध्यरात्री में भी
कभी-कभी उन सड़कों पर
घरघराती-सरसराती
दौड़ती-भागती
तेज रफ्तार गाडियां
बिल्कुल खुली हवा की तरह
जिसे कोई रोक नहीं पाता
सचमुच पहेली ही तो है
महानगर की रात
बिल्कुल अनसुलझी पहेली
कभी पुलिसिया गाड़ी का सायरन
निरंतर लोगों की चहलकदमी
कहीं संगीत का तेज शोर
कहीं क्लबों में प्रकाश के साथ
रंगीन होती रातें
शराब की उड़ती गंध
साथ ही कहीं बजता मृदंग
कहीं डीजे का बबाल
कहीं घरों में पकता ख्याल
अदृश्यता का लेसमात्र
अंश नहीं है महानगर में
सब कुछ स्पष्ट, खुला, साफ
बिल्कुल शीशे की तरह
जिसके सामने खड़े हो तो
अक्स दिखता है अपना
आखिर कब होती है
महानगर में रात
शायद कभी नहीं होती
नहीं होती महानगर में रात।

1 टिप्पणी:

  1. Very good poem.

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