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मंगलवार, 9 जुलाई 2013

आखिर क्यों हो रहा जैव परिवर्धित बीज का विरोध ?

जैव परिवर्धित बीज स्वास्थ्य के लिए घातक होते हैं। कृषि संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने भी जैव परिवर्धित बीज को कटघरे में खड़ा कर दिया है। जीएम बीज मुक्त बिहार की ओर से आयोजित एक प्रेस कांफ्रेंस में जब यह बात कही गई थी, तब देश के तमाम लोगों को पता भी नहीं था कि आखिर ये जीएम प्रौद्योगिकी से तैयार बीज हैं क्या। हलांकि जीएम फसलों से किसानों को कोई मदद नहीं मिली है और कानूनी अनुमित के बगैर ही आम आदमी को जीएम सीड से उत्पादित फूड खिलाया जा रहा है ये बात सत्य है। तेल, रिफाइंड और दूध उत्पादों का उत्पादन जीएम प्रौद्योगिकी के जरिए ही किया जा रहा है और हम इसे खाने को मजबूर हैं।
जीएम प्रौद्योगिकी के द्वारा बीजों का उत्पादन करने वाली कंपनियों की माने तो जेनेटेकली मॉडीफाइड सीड के इस्तेमाल से खाद्यान्नों की उपज और गुणवत्ता को प्रभावित किए बगैर बायोफ्यूल की मांग की जा सकती है। इन बीजों के इस्तेमाल से खाद्यान्नों के उत्पादन को सुधारने के साथ इससे बायोफ्यूल की मांग को भी पूरा किए जाने में भी मदद मिल सकती है। लेकिन यह किस हद तक सही है यह समय के साथ ही पता चल पाएगा। कंपनी यह तक मानती है कि इन बीजों के इस्तेमाल से अनाजों की बढ़ती कीमतों पर भी नकेल कसा जा सकता है क्योंकि इन बीजों के जरिए खाद्यान की कमी को उत्पादन द्वारा पूरा किया जा सकता है।
लेकिन इन सब बातों से अलग आमजन के स्वास्थ्य के बारे में सोचा जाए तो स्पष्ट समझ में आ जाएगा कि तेज और अंधे वैश्वीकरण के दुष्प्रभाव के परिणाम दिखाई देने लगे हैं। कृषि मंत्रालय की स्थायी संसदीय समिति की रिपोर्ट ने तय किया है कि आनुवंशिक तौर से परिवर्धित बीजों से उपजाई गयी फसलें मनुष्य व अन्य सभी जीव- जंतुओं के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर डाल रही हैं। भेड़ों पर किए परीक्षण में जब इन्हें बीटी कपास के बीज खिलाए गए तो इनके गुर्दे, फेफड़े, जननांग और हृदय के वजन व आकार में आश्चर्यजनक कमी देखने में आई। देश में लाखों टन बीटी कपास के बीजों का खाद्य तेलों के निर्माण में उपयोग हो रहा है। जाहिर है, तेल मनुष्य के शरीर पर दुष्प्रभाव छोड़ रहा होगा। इसके बावजूद हैरानी इस बात पर है कि आनुवंशिक अभियांत्रिकी अनुमोदन समिति ने बीटी बैंगन के उत्पादन की मंजूरी दे दी जबकि इसके व्यावसायिक उपयोग का दो साल पहले जबरदस्त विरोध हुआ था। देश की कुल कपास कृषि भूमि में 93 फीसदी खेती बीटी बीजों से ही हो रही है, इसका चलन 2002 में शुरू हुआ था। उस समय केंद्र में राजग गठबंधन सरकार थी। तब भी कपास के इन संशोधित बीजों के इस्तेमाल की मंजूरी का विरोध हुआ  था। बीटी बीजों का सबसे बड़ा और प्रमुख दुखद पहलू यह है कि ये बीज एक बार चलन में आ जाते हैं तो परंपरागत बीजों का वजूद ही समाप्त कर देते हैं। बीटी कपास के बीज पिछले एक दशक से चलन में हैं। जांचों से तय हुआ है कि कपास की 93 फीसदी परंपरागत खेती को कपास के ये बीटी बीज खत्म कर चुके हैं।
दरअसल भारत के कृषि और डेयरी उद्योग को काबू में लेना अमेरिका की प्राथमिकताओं में शामिल है। जिससे यहां के बड़े और बुनियादी जरूरत वाले बाजार पर उसका कब्जा हो जाए। इसलिए जीएम प्रौद्योगिकी से जुड़ी कंपनियां और चंद कृषि वैज्ञानिक भारत समेत दुनिया में बढ़ती आबादी का बहाना बनाकर इस तकनीक के द्वारा खाद्य सुरक्षा की गारंटी का भरोसा दिलाते हैं। लेकिन बिना जीएम बीजों का इस्तेमाल किए ही पिछले एक दशक में हमारे खाद्यान्नों के उत्पादन में पांच गुना बढ़ोतरी दर्ज की गई है। जाहिर है, हमारे परंपरागत बीज उन्नत किस्म के हैं और वे भरपूर फसल पैदा करने में सक्षम हैं। हमें जरूरत है उनके भंडारण की समुचित व्यवस्था दुरुस्त करने की। ऐसा न होने के कारण हर साल हमारा लाखों टन खाद्यान्न खुले में पड़ा रहने की वजह से सड़ जाता है।
केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने भी पोषण और कृषि के क्षेत्रों के विशेषज्ञों की एक सभा में ऐसी कृषि व्यवस्था का विरोध किया और स्पष्ट तौर पर कहा था कि देश में प्रथम हरित क्रांति और आज की हरित क्रांति के बीच काफी अंतर आ चुका है। भारत में पहली हरित क्रांति के लिए गेहूं और धान की नई किस्में मैक्सिको स्थित सिम्मिट और फिलिपींस स्थित आइआरआइ से आई,  पर आज ऐसा नहीं हैं। फसल की नई किस्में मोंसेंटो और सिंजेंटा से आ रही है। ये वे दो विशाल कंपनियां हैं, जो जीएम से परिवर्तित फसलों की सबसे बड़ी प्रायोजक हैं। आज खेल का तरीका कुछ नया हो गया है। जयराम रमेश खुद जीएम बीजों के इस्तेमाल से हो रही खेती का विरोध करते दिखे। जयराम रमेश ने कृषि एवं पर्यावरण मंत्री रहते हुए बीटी बैंगन पर रोक लगाई थी। कुछ समय पहले ही पर्यावरण संगठन ग्रीनपीस ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि किस तरह जीएम फसलों का नकारात्मक असर शरीर के रोग प्रतिरोधात्मक तंत्र पर पड़ता है। लेकिन इसके बावजूद हमारे देश में जैवसुरक्षा आकलन की प्रक्रिया में पर्याप्त सावधानी नहीं बरती जा रही। देश-विदेश के लोग पहले से ही हमारी कृषि के क्षेत्र में कामयाबी पर हैरान होते रहे हैं। ऐसे में देश में जीएम बीज को लाने की जरूरत नहीं है इसलिए केंद्र सरकार को अपनी जीएम बीज नीति पर फिर से विचार करना चाहिए।

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